नई दिल्ली | अमेरिका द्वारा कथित जबरन श्रम (फोर्स्ड लेबर) के मुद्दों को ढाल बनाकर भारत समेत दुनिया के ५४ देशों पर अतिरिक्त आयात शुल्क (टैरिफ) थोपने की तैयारी का भारत सरकार ने कड़ा संज्ञान लिया है। वाणिज्य मंत्रालय ने बुधवार को स्थिति साफ करते हुए कहा कि भारत इस पूरे घटनाक्रम को लेकर अमेरिकी प्रशासन के साथ लगातार उच्चस्तरीय संवाद बनाए हुए है। इसके साथ ही दोनों देशों के बीच लंबे समय से लंबित अंतरिम व्यापार समझौते को अमलीजामा पहनाने के लिए भी समानांतर बातचीत जारी है।
अमेरिकी यूएसटीआर का प्रस्ताव: ५४ देशों पर साढ़े बारह फीसदी तक अतिरिक्त टैक्स की तैयारी
अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय (USTR) ने अपने 'सेक्शन ३०१' कानून के तहत भारत सहित ५४ विकासशील और प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं से आने वाले सामानों पर १२.५ प्रतिशत तक का नया अतिरिक्त शुल्क लगाने का एकतरफा प्रस्ताव तैयार किया है। फिलहाल वाशिंगटन में इस विवादित प्रस्ताव पर संबंधित पक्षों से रायशुमारी की जा रही है, जिसके लिए आपत्तियां और सुझाव भेजने की अंतिम तारीख ६ जुलाई तय की गई है, जबकि ७ जुलाई को इस पर सार्वजनिक सुनवाई होनी है। अमेरिकी प्रशासन का यह नया दांव वर्तमान में लागू १० प्रतिशत के उस अस्थायी आयात शुल्क की जगह ले सकता है, जिसकी कानूनी समयसीमा आगामी २४ जुलाई को समाप्त हो रही है।
तीसरे देशों का बहाना बनाकर भारत पर दबाव बनाने की रणनीति: व्यापार विशेषज्ञ
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के संस्थापक अजय श्रीवास्तव सहित कई अंतरराष्ट्रीय व्यापार विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अमेरिका के इस एकतरफा कदम को कानूनी रूप से चुनौती देनी चाहिए। विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका यह आरोप नहीं लगा रहा कि भारतीय कारखानों में जबरन श्रम होता है, बल्कि उसका अजीबोगरीब तर्क यह है कि भारत जैसे देश उन वस्तुओं के आयात पर पर्याप्त पाबंदी नहीं लगाते जो किसी तीसरे देश में जबरन श्रम से बनी हों। जानकारों का कहना है कि वाशिंगटन इस जांच और दंडात्मक टैरिफ का हौवा खड़ा करके भारत के साथ चल रही द्विपक्षीय व्यापार वार्ता (BTA) में अपना पलड़ा भारी करना चाहता है, जिसका भारत को कड़ा प्रतिवाद करना चाहिए।
भारतीय कपड़ा, कालीन और चमड़ा उद्योग पर संकट; दिल्ली में वार्ता का दौर जारी
यदि अमेरिका का यह प्रस्ताव कानून का रूप लेता है, तो इसका सबसे सीधा और घातक असर भारत के उन क्षेत्रों पर पड़ेगा जहां बड़े पैमाने पर रोजगार मिलता है। इनमें मुख्य रूप से गारमेंट्स (कपड़ा और परिधान), कालीन उद्योग, लेदर (चमड़ा उत्पाद) और पीतल के हस्तशिल्प शामिल हैं। अतिरिक्त टैक्स लगने से अमेरिकी बाजार में भारतीय सामान महंगे हो जाएंगे और प्रतिस्पर्धी देशों के सामने हमारे निर्यातकों को नुकसान होगा। ईवाई (EY) इंडिया के नीतिगत रणनीतिकारों के अनुसार, भारत के पास अपनी आपत्तियां दर्ज कराने के लिए द्विपक्षीय वार्ता एक बड़ा मंच है। विशेष बात यह है कि अमेरिकी व्यापारिक प्रतिनिधिमंडल इस समय १ जून से ४ जून तक नई दिल्ली में ही मौजूद है, जहां दोनों देशों के शीर्ष अधिकारी बाजार पहुंच, कृषि और इस नए टैरिफ विवाद को सुलझाने के लिए गहन मंथन कर रहे हैं।


