जयपुर | राजस्थान में राज्यसभा चुनाव को लेकर सियासी पारा चढ़ गया है। कांग्रेस आलाकमान ने एक बार फिर अपने पुराने और विश्वसनीय चेहरे नीरज डांगी पर दांव खेलते हुए उन्हें उच्च सदन भेजने का निर्णय लिया है। हालांकि, पार्टी के इस कदम के बाद राजनीतिक गलियारों में कांग्रेस की सामाजिक प्रतिनिधित्व की नीति को लेकर बहस छिड़ गई है। जानकारों का कहना है कि पार्टी ने किसी नए चेहरे या दूसरे सामाजिक वर्ग को मौका देने के बजाय एक बार फिर पुराने नेतृत्व को ही प्राथमिकता दी है।
टीकाराम जूली के होते हुए भी डांगी पर जताया दोबारा भरोसा
नीरज डांगी को दोबारा प्रत्याशी बनाए जाने से पार्टी के भीतर और बाहर कई तरह के सवाल खड़े हो रहे हैं। दरअसल, राजस्थान में नेता प्रतिपक्ष की कमान पहले से ही दलित समुदाय के कद्दावर नेता टीकाराम जूली के हाथों में है, जिन्हें राज्य में कांग्रेस का प्रमुख चेहरा माना जाता है। ऐसे में एक ही वर्ग से दोबारा प्रतिनिधित्व देने पर कयासबाजी तेज है। सियासी हलकों में यह चर्चा भी है कि नीरज डांगी को कोई बड़ा जनआंदोलन या व्यापक जनाधार वाला नेता नहीं माना जाता। वे साल 2008 और 2013 के विधानसभा चुनाव हार चुके हैं, इसके बावजूद पार्टी ने उन्हें 2020 और अब 2026 में लगातार दूसरी बार राज्यसभा का टिकट थमाया है।
भाजपा के जातीय संतुलन के सामने कांग्रेस की पुरानी रणनीति
एक तरफ जहां सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने इस चुनाव में अपनी रणनीति बदलते हुए केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू की जगह राजस्थान की दो बेहद रसूखदार जातियों—जाट और गुर्जर समुदाय को साधने के लिए स्थानीय चेहरों को मैदान में उतारा है, वहीं कांग्रेस ने इसके विपरीत कदम उठाया है। भाजपा का यह दांव भविष्य के चुनावों में इन प्रभावशाली समाजों के बड़े वोट बैंक को अपने पाले में रखने की सोची-समझी कोशिश माना जा रहा है। इसके उलट, सामाजिक न्याय का नारा देने वाली कांग्रेस द्वारा कोई नया जातीय समीकरण न बनाने या नए चेहरे को आगे न लाने के कारण आलोचक दल की दूरदर्शिता पर सवाल उठा रहे हैं।
गहलोत खेमे के साथ दिल्ली दरबार में मजबूत पकड़ का मिला फायदा
राजनीतिक सूत्रों के मुताबिक, टिकट फाइनल होने से ठीक पहले नीरज डांगी ने जयपुर में पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से विशेष मुलाकात की थी। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि डांगी को न केवल सूबे के गहलोत गुट का पूरा वरदहस्त हासिल है, बल्कि उन्होंने केंद्रीय नेतृत्व (दिल्ली दरबार) में भी अपने लिए मजबूत साख बना ली है। यही वजह रही कि उनके नाम पर पार्टी के भीतर कोई मतभेद या विरोध खुलकर सामने नहीं आया और उनका टिकट लगभग सर्वसम्मति से तय हो गया। कुल मिलाकर, जहां भाजपा नए सामाजिक समीकरणों को मजबूत करने में जुटी है, वहीं कांग्रेस ने वफादारी और संगठनात्मक संतुलन को ही सर्वोपरि रखा है।


