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    अशोक गहलोत के हमलों का जवाब नहीं देंगे पायलट? करीबी ने बताई रणनीति

    जयपुर। राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की ओर से कांग्रेस नेता सचिन पायलट पर एक बार फिर तीखा प्रहार किए जाने के बाद अब पायलट खेमे की प्रतिक्रिया सामने आई है। पायलट के बेहद करीबी सूत्रों ने सोमवार को जानकारी दी कि उन्होंने इन बयानों पर पूरी तरह मौन रहने का फैसला किया है। पूर्व उपमुख्यमंत्री इस अंदरूनी बयानबाजी में उलझने के बजाय नीट पेपर लीक, सीबीएसई विवाद और लगातार बढ़ रही महंगाई जैसे जनहित के गंभीर मुद्दों पर भारतीय जनता पार्टी को घेरने की बड़ी रणनीति तैयार कर रहे हैं।

    विवादों से दूरी बनाकर जनता के मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने की रणनीति

    सूत्रों का कहना है कि सचिन पायलट ने पहले की तरह इस बार भी अशोक गहलोत के हमलों पर पलटवार न करने का मन बनाया है और वे हमेशा कटु भाषा के बजाय राजनीतिक मर्यादा व शालीनता को प्राथमिकता देते आए हैं। उनका मानना है कि इस वक्त देश में नीट पेपर लीक और युवाओं की शिक्षा से जुड़े विषय आपसी मतभेदों से कहीं ज्यादा बड़े हैं। इसके साथ ही पायलट राजस्थान की मौजूदा भजनलाल शर्मा सरकार को उसके अधूरे वादों पर कटघरे में खड़ा करने पर ध्यान लगा रहे हैं, क्योंकि सरकार के कार्यकाल को ढाई साल से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी जनहित के कई वादे ठंडे बस्ते में पड़े हैं।

    गहलोत का पुराना दावा और वर्ष 2022 के सियासी घटनाक्रम का सच

    दरअसल, रविवार को अशोक गहलोत ने एक बयान देकर फिर से सियासी गलियारों में हलचल तेज कर दी थी। गहलोत ने कहा था कि सितंबर 2022 में जयपुर में जो कुछ भी हुआ, वह कांग्रेस आलाकमान के खिलाफ कोई बगावत नहीं थी, बल्कि विधायकों ने सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाए जाने की संभावना के विरोध में अपनी असहमति दर्ज कराई थी। उस दौरान बुलाई गई कांग्रेस विधायक दल की बैठक में कई विधायक शामिल नहीं हुए थे और वे गहलोत के करीबी नेता शांति धारीवाल के घर पर जमा हो गए थे। इस वजह से पार्टी के इतिहास में पहली बार आलाकमान को अधिकृत करने का पारंपरिक प्रस्ताव पास नहीं हो सका था। गहलोत ने यह भी कहा कि वे खुद कांग्रेस अध्यक्ष बनने की दौड़ में थे, लेकिन इस घटना से उनकी छवि प्रभावित हुई, जिसके लिए उन्होंने सोनिया गांधी से माफी भी मांगी थी।

    बगावत के आरोपों पर पायलट की 'भूलो और माफ करो' की नीति

    अशोक गहलोत ने अपने दावों में यह भी कहा कि सचिन पायलट ने साल 2020 में उनकी सरकार के खिलाफ बगावत की थी, जिसके कारण विधायक उन्हें मुख्यमंत्री के रूप में स्वीकार करने को राजी नहीं थे। गहलोत के इस नए बयान से दोनों नेताओं के बीच का पुराना मनमुटाव एक बार फिर सतह पर आ गया है। हालांकि, सचिन पायलट सार्वजनिक मंचों से कई बार स्पष्ट कर चुके हैं कि उन्होंने केंद्रीय नेतृत्व के परामर्श पर "भूलो और माफ करो" का रास्ता चुना है। अतीत में गहलोत द्वारा अभद्र शब्दों का प्रयोग किए जाने पर भी पायलट ने संयम बनाए रखा था और मल्लिकार्जुन खरगे व राहुल गांधी के साथ हुई बैठक के बाद वे पार्टी हित में आगे बढ़ गए थे। इसी का परिणाम है कि उन्हें अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का महासचिव बनाया गया और उनकी देखरेख में पार्टी ने केरल जैसे राज्यों में बेहतरीन चुनावी प्रदर्शन किया।

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