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    Homeराज्यमध्यप्रदेशपार्षद से संसद तक का सफर: महेश केवट बने राज्यसभा उम्मीदवार

    पार्षद से संसद तक का सफर: महेश केवट बने राज्यसभा उम्मीदवार

    निवाड़ी: मध्य प्रदेश की राजनीति में आए भूचाल के बाद निवाड़ी जिले के ओरछा कस्बे के हरिशंकरी मुहल्ले में रहने वाले महेश केवट का राज्यसभा जाने का रास्ता लगभग साफ हो गया है। कांग्रेस प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन का नामांकन खारिज होने के बाद, यदि कांग्रेस को अदालत से कोई राहत नहीं मिलती है, तो महेश केवट मध्य प्रदेश से केवट, माझी, मल्लाह, रैकवार और भोई समाज के पहले राज्यसभा सांसद बनकर इतिहास रचेंगे।

    विवादों से भरा रहा राजनीतिक सफर

    महेश केवट का राजनीतिक सफर काफी उतार-चढ़ाव वाला रहा है। वह साल 2000 से 2005 तक ओरछा नगर परिषद के उपाध्यक्ष रहे। इसके बाद उनकी पत्नी ने भाजपा के टिकट पर नगर परिषद अध्यक्ष का चुनाव लड़ा, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा। साल 2022 के नगर परिषद चुनाव के दौरान स्थानीय भाजपा नेतृत्व ने महेश केवट पर पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाते हुए उन्हें निष्कासित कर दिया था।

    हालांकि, बाद में महेश केवट और निवाड़ी विधायक अनिल जैन ने जब भोपाल स्थित भाजपा प्रदेश कार्यालय में अपने निष्कासन की फाइल निकलवाई, तो वहां इस कार्रवाई का कोई रिकॉर्ड ही नहीं मिला। जांच में सामने आया कि सोशल मीडिया पर कुछ फर्जी पत्र वायरल कर उनके निष्कासन की झूठी अफवाह फैलाई गई थी। इसके बाद साल 2023 में तत्कालीन प्रदेश महामंत्री भगवानदास सबनानी की तरफ से आधिकारिक आदेश जारी कर उनके निष्कासन को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया।

    लोकलुभावन छवि और ऐसे आए बीजेपी की नजर में

    महेश केवट का परिवार बुंदेलखंड के प्रसिद्ध लोकदेवता लाला हरदौल की जन्मस्थली ओरछा के फूलबाग स्थित 'हरदौल बैठका' की नियमित सेवा करता है, जिससे उनकी समाज में गहरी धार्मिक और सामाजिक पैठ है। पेशे से सीमेंट व्यवसायी महेश केवट पर भाजपा की नजर तब पड़ी, जब संगठन और सरकार के बोर्ड व निगम मंडलों में ऐसे नए चेहरों को शामिल करने का मंथन चल रहा था, जिन्हें अब तक कोई बड़ी जिम्मेदारी न मिली हो।

    पार्टी उन पिछड़ी जातियों को प्रतिनिधित्व देना चाहती थी जिनकी राजनीतिक भागीदारी बेहद कम थी। इसी रणनीति के तहत महेश केवट को मछुआ कल्याण बोर्ड का अध्यक्ष चुना गया। हालांकि, अध्यक्ष बनते ही उनके विरोधियों ने एक बार फिर सोशल मीडिया पर उनके पुराने निष्कासन के फर्जी पत्रों को वायरल करना शुरू कर दिया, जिसके बाद भाजपा के तत्कालीन जिलाध्यक्ष को फेसबुक पर पोस्ट लिखकर इस पूरे विवाद का पटाक्षेप करना पड़ा था।

    जातीय समीकरणों ने बनाया राज्यसभा का दावेदार

    बीजेपी ने मध्य प्रदेश में अपनी सुरक्षित सीटों पर राष्ट्रीय महामंत्री तरुण चुग और प्रदेश मंत्री रजनीश अग्रवाल को उम्मीदवार घोषित किया था। इसके बाद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और पार्टी नेतृत्व ने तय किया कि तीसरी सीट पर उम्मीदवार सामाजिक और जातिगत समीकरणों के आधार पर उतारा जाना चाहिए। कई नामों पर विचार-मंथन हुआ, लेकिन जब जीत के लिए जरूरी 58 विधायकों के आंकड़े को लेकर सियासी टेंशन दिखी, तो रणनीति बदली गई। पार्टी ने तय किया कि एक ऐसे वर्ग से कैंडिडेट उतारा जाए, जिसकी उम्मीदवारी मात्र से पूरे प्रदेश और पड़ोसी राज्यों में एक बड़ा राजनीतिक संदेश जाए। इसके बाद महेश केवट के नाम पर अंतिम मुहर लगी।

    उत्तर प्रदेश के आगामी चुनाव में मिलेगी बड़ी जिम्मेदारी

    महेश केवट को राज्यसभा भेजने के पीछे भाजपा की एक बहुत बड़ी चुनावी रणनीति छिपी है। अगले साल फरवरी-मार्च में उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं। ओरछा की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि यह तीन तरफ से मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बॉर्डर से लगा हुआ है और बुंदेलखंड के मुख्य शहर झांसी से इसकी दूरी महज 15 किलोमीटर है।

    उत्तर प्रदेश की राजनीति में भाजपा, समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) तीनों में ही केवट, निषाद और कश्यप समाज का बहुत बड़ा दबदबा है। भाजपा में जहां डॉ. संजय निषाद, साध्वी निरंजन ज्योति, जयप्रकाश निषाद और बाबूराम निषाद जैसे कद्दावर नेता हैं, वहीं सपा में रामभुआल निषाद और बसपा में लालचंद निषाद जैसे चेहरे इस समाज का नेतृत्व करते हैं। ऐसे में भाजपा अब महेश केवट का उपयोग उत्तर प्रदेश के चुनाव में प्रचारक के तौर पर करेगी। झांसी से लेकर पूरे गंगा किनारे फैले केवट-निषाद समाज के वोट बैंक को साधने में महेश केवट की भूमिका बेहद अहम होने वाली है।

    मध्य प्रदेश में भी बेहद प्रभावी है यह समाज

    सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश में भी चंबल से लेकर महाकौशल तक केवट समाज चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की ताकत रखता है:

    • ग्वालियर-चंबल: मेहगांव, अटेर, लहार, मुरैना, दिमनी, अंबाह और दतिया जैसी सीटों पर केवट और मल्लाह मतदाताओं की संख्या 15,000 से 25,000 तक है।

    • बुंदेलखंड: टीकमगढ़, जतारा, पृथ्वीपुर, खरगापुर, निवाड़ी, चंदला और पन्ना में रैकवार और केवट समाज का पारंपरिक वोट बैंक बेहद निर्णायक माना जाता है।

    • विंध्य और महाकौशल: रीवा, सेमरिया, अमरपाटन, मैहर, सिहोरा और जबलपुर की सीटों पर माझी, बर्मन और बिंद समाज चुनावी नतीजों को सीधा प्रभावित करते हैं।

    • मध्य क्षेत्र: होशंगाबाद, बाबई (सोहागपुर), बुधनी और उदयपुरा जैसी नर्मदा किनारे की सीटों पर केवट, कहार और ढीमर समाज के वोट किसी भी दल की जीत-हार तय करते हैं।

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