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    टेक्सटाइल सेक्टर को मिला बूस्ट, अमेरिकी टैरिफ कम होने से ऑर्डर में उछाल

    मुंबई। वैश्विक स्तर पर मांग में आए सकारात्मक उछाल और अमेरिकी आयात शुल्क से जुड़ी अनिश्चितताएं समाप्त होने के चलते भारतीय टेक्सटाइल (कपड़ा) उद्योग अब एक मजबूत सुधार के दौर में कदम रख चुका है। बाजार विश्लेषकों की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, कपड़ा क्षेत्र के बुनियादी सिद्धांतों में आया सुधार, मांग की स्पष्टता और सरकार की अनुकूल नीतियां इस उद्योग के लिए नए आशावाद का मार्ग प्रशस्त कर रही हैं। इस पूरे परिदृश्य में सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण बदलाव फरवरी 2026 के अंत में देखने को मिला, जब भारतीय कपड़ा उत्पादों पर लगने वाले अमेरिकी शुल्कों को 50 प्रतिशत से घटाकर सीधे 10 प्रतिशत के स्तर पर ला दिया गया। अमेरिका द्वारा पूर्व में लगाए गए इन दंडात्मक और प्रतिशोधात्मक शुल्कों के हटने से भारतीय निर्यातकों को बहुत बड़ी राहत मिली है, जिससे न केवल व्यापार सामान्य हुआ है बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में निर्यात की मात्रा भी स्थिर हुई है।

    अमेरिकी शुल्क कटौती से बहाल हुई वैश्विक प्रतिस्पर्धा

    अमेरिकी बाजार में आया यह नीतिगत बदलाव भारतीय कपड़ा क्षेत्र के लिए एक गेम-चेंजर साबित हो रहा है। इससे पहले दंडात्मक शुल्कों की वजह से भारतीय वस्त्रों पर कुल कर का बोझ 65 से 69 प्रतिशत तक पहुंच गया था, जिसने भारतीय उत्पादों को वैश्विक बाजार में काफी महंगा बना दिया था। अब इन भारी-भरकम शुल्कों के हटने से भारतीय निर्यातकों ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी खोई हुई प्रतिस्पर्धात्मकता फिर से हासिल कर ली है। इसके साथ ही अमेरिकी बाजार में जो मांग लंबे समय से थमी हुई थी, वह अब तेजी से बाहर आ रही है, जिसके कारण भारतीय उत्पादों के क्रय आदेशों (ऑर्डर्स) में भारी बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है।

    उत्पादन दक्षता में वृद्धि और कताई खंड के बुनियादी ढांचे में सुधार

    उद्योग के आंतरिक ढांचे की बात करें तो कताई (स्पिनिंग) खंड में क्षमता का बड़े पैमाने पर समेकन हुआ है, जिसने परिचालन और उत्पादन की दक्षता को काफी बढ़ा दिया है। इसके अलावा कच्चे कपास की कीमतों में आई स्थिरता ने भारतीय निर्माताओं की लागत प्रतिस्पर्धा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दोबारा मजबूत किया है। यार्न (धागे) के प्रसार और विपणन में देखे जा रहे इस तेज सुधार ने पूरी टेक्सटाइल वैल्यू चेन (मूल्य श्रृंखला) के मुनाफे को बढ़ा दिया है। आंतरिक रूप से मजबूत हुए ये बुनियादी सिद्धांत भारतीय निर्माताओं को भविष्य की बड़ी वैश्विक मांग को पूरा करने के लिए एक बेहद ठोस और सुरक्षित धरातल प्रदान कर रहे हैं।

    वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में भारत का बढ़ता दबदबा और मुक्त व्यापार समझौते

    भारत इस समय ब्रिटेन (यूके), यूरोपीय संघ (ईयू) और ऑस्ट्रेलिया जैसे दुनिया के सबसे बड़े उपभोक्ता बाजारों के साथ मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) को अंतिम रूप देने में जुटा है, जो इस उद्योग को एक मजबूत ढांचागत संबल देंगे। दूसरी तरफ, वैश्विक खरीदार अब अपनी आपूर्ति श्रृंखला की सुरक्षा के लिए बांग्लादेश और कंबोडिया जैसे पारंपरिक शुल्क-मुक्त देशों पर अपनी अत्यधिक निर्भरता को कम कर रहे हैं। वे चीन के विकल्प के रूप में अपनी सोर्सिंग में विविधता लाना चाहते हैं, जिसमें भारत एक भरोसेमंद और दीर्घकालिक सोर्सिंग हब के रूप में उभर रहा है। मजबूत घरेलू मांग और अनुशासित पूंजी निवेश के बल पर यह क्षेत्र स्थायी विकास के लिए पूरी तरह तैयार है, हालांकि जानकारों का मानना है कि निवेशकों को कपास की कीमतों की भविष्य की चाल पर भी नजर रखनी होगी।

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