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    बिजनेस से राजनीति तक दमदार सफर, निर्दलीय रहकर भी दिखाया वोटों का दम

    रांची। रिलायंस इंडस्ट्रीज में कॉरपोरेट मामलों के निदेशक परिमल नाथवानी के बहुआयामी व्यक्तित्व के कई विशिष्ट पहलू हैं। अहमदाबाद के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट से प्रबंधन में पीएचडी की उपाधि प्राप्त नाथवानी ने करीब 9 वर्षों तक गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन के उपाध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाली और अहमदाबाद में निर्मित विश्व के सबसे बड़े क्रिकेट स्टेडियम के आधुनिक स्वरूप की रूपरेखा तैयार करने में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह तथा जय शाह के साथ महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके अतिरिक्त वर्ष 2019 में वे गुजरात फुटबॉल एसोसिएशन के अध्यक्ष भी निर्वाचित हुए। कॉरपोरेट जगत में शीर्ष पायदान पर पहुंचने के बाद जब उन्होंने सक्रिय राजनीति में प्रवेश करने का मन बनाया, तो उन्होंने सीधे झारखंड का रुख किया। मार्च 2008 में झारखंड की दो राज्यसभा सीटों पर हुए द्विवार्षिक चुनाव में वे बतौर निर्दलीय प्रत्याशी चुनावी समर में उतरे थे।

    2008 का ऐतिहासिक राज्यसभा चुनाव और क्रॉस वोटिंग का समीकरण

    वर्ष 2008 के इस बेहद दिलचस्प राज्यसभा चुनाव में परिमल नाथवानी ने "झारखंड को गुजरात में बदलना है" का एक प्रभावी नारा दिया था। अपने कुशल रणनीतिक और राजनीतिक प्रबंधन के बल पर उन्होंने तत्कालीन सत्तारूढ़ यूपीए (UPA) खेमे के समीकरणों को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। उस चुनाव में उन्हें प्रथम वरीयता के 16 मत तथा द्वितीय वरीयता के 5 मतों सहित कुल 21 विधायकों का समर्थन प्राप्त हुआ। अलग-अलग राजनीतिक दलों के विधायकों द्वारा अपने अधिकृत प्रत्याशियों के खिलाफ जाकर एक निर्दलीय उम्मीदवार के पक्ष में किया गया यह मतदान राज्य की सियासत में क्रॉस वोटिंग का एक बड़ा उदाहरण बना, जिसने नाथवानी की जीत का मार्ग प्रशस्त किया। दूसरी तरफ, भाजपा के जयप्रकाश नारायण सिंह को प्रथम वरीयता के 35 मत (भाजपा के 29 और जदयू के 5 मत) मिले थे और वे भी विजयी रहे थे, जबकि तत्कालीन मुख्यमंत्री मधु कोड़ा सहित तीन विधायकों के मतदान से अनुपस्थित रहने के कारण जीत के लिए जरूरी मतों का कोटा कम हो गया, जिसका सीधा लाभ नाथवानी को मिला।

    दिग्गज कानूनी सलाहकार की शिकस्त और राजनीतिक दलों में बड़ी सेंधमारी

    इस त्रिकोणीय और कड़े मुकाबले में देश के विख्यात अधिवक्ता आर के आनंद ने भी निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर दांव खेला था, जिन्हें ऐन वक्त पर कांग्रेस के 9 और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के 7 विधायकों का समर्थन प्राप्त हुआ था। आर के आनंद को पहली वरीयता के 17 मत हासिल हुए थे जो कि नाथवानी को मिले 16 मतों से एक अधिक था, परंतु आनंद द्वितीय वरीयता का एक भी अतिरिक्त वोट प्राप्त करने में असफल रहे। इसके विपरीत नाथवानी ने दूसरी वरीयता के 5 मतों की बदौलत बाजी मार ली और आनंद 17 मतों पर ही सिमटकर चुनाव हार गए। इसी चुनाव में झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के पास कुल 17 विधायक होने के बावजूद उनके अधिकृत प्रत्याशी किशोरी लाल को मात्र 8 वोट मिले और उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा क्योंकि झामुमो के 9 विधायकों ने दलीय अनुशासन तोड़कर क्रॉस वोटिंग की थी।

    सामाजिक सरोकार, आदिवासियों का कल्याण और तीसरी बार का चुनावी रण

    संसदीय इतिहास में ऐसा बहुत कम देखा जाता है जब कोई निर्दलीय प्रत्याशी लगातार दूसरी बार भी उच्च सदन का चुनाव जीतने में सफल रहा हो, लेकिन परिमल नाथवानी ने वर्ष 2014 के चुनाव में पुनः निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में जीत दर्ज कर सबको चौंका दिया था। इस सफलता के पीछे उनकी धरातलीय राजनीतिक सक्रियता और सामाजिक कार्यों को मुख्य वजह माना जाता है। सांसद बनने के बाद उन्होंने गुमला जिले के एक पूर्व नक्सली थिंबू उरांव को जेल से रिहाई के बाद आर्थिक सहायता प्रदान कर समाज की मुख्यधारा में लौटने में मदद की, जिसने बाद में अपने गांव में एक विद्यालय स्थापित किया। इसके साथ ही उन्होंने रांची के करमटोली में आदिवासी छात्रों के लिए एक आधुनिक छात्रावास का निर्माण करवाया, जिसमें अंग्रेजी प्रशिक्षण के लिए विशेष शिक्षक और पुस्तकालय की व्यवस्था की गई, तथा खेल के प्रति अपने लगाव के चलते कावली नामक आदिवासी बाहुल्य गांव में एक फुटबॉल स्टेडियम भी बनवाया। अब यही परिमल नाथवानी एक बार फिर झारखंड से तीसरी बार राज्यसभा पहुंचने के लिए चुनाव मैदान में डटे हैं।

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