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    मध्य प्रदेश में 86 डॉक्टरों का संकट, डिग्री अटकी और लोन चुकाना हुआ मुश्किल

    भोपाल। मध्य प्रदेश के चिकित्सा क्षेत्र से एक बेहद चौंकाने वाला मामला प्रकाश में आया है, जहां राज्य के 86 डॉक्टरों के शैक्षणिक प्रमाणपत्र और डिग्रियां सरकारी विभागों के पास 'बंधक' बनी हुई हैं। एक तरफ जहां प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों के आधे से अधिक पद रिक्त पड़े हैं, वहीं दूसरी तरफ मूल डिग्रियां न मिलने के कारण इन योग्य डॉक्टरों को गंभीर संकट का सामना करना पड़ रहा है। इस प्रशासनिक गतिरोध के चलते किसी को अपना बैंक लोन चुकाने में भारी परेशानी हो रही है, तो किसी का विवाह तक टल गया है।

    डॉक्टरों की आपबीती और मूल दस्तावेज अटकने का संकट

    सेना की चिकित्सा विंग में अपनी सेवाएं देने के बाद भोपाल वापस आए मेजर डॉ. यश श्रीवास्तव ने अपनी व्यथा साझा की है। उन्होंने बताया कि शॉर्ट सर्विस कमीशन (एसएससी) के जरिए सेना में सेवा देने के बाद कुछ पारिवारिक कारणों से उन्हें वापस लौटना पड़ा। उन्होंने दिसंबर 2025 में जनरल सर्जरी में एमएस (मास्टर्स ऑफ सर्जरी) की डिग्री पूरी की थी। नियमानुसार, दाखिले के समय उनसे ग्रामीण क्षेत्रों में अनिवार्य सेवा देने का एक शासकीय बॉन्ड भरवाया गया था, परंतु कोर्स पूरा होने के बाद भी सरकार द्वारा उन्हें कहीं पोस्टिंग नहीं दी गई। विडंबना यह है कि इस बॉन्ड के चक्कर में उनकी 10वीं, 12वीं और एमबीबीएस जैसी पिछली सभी मूल डिग्रियां भी चिकित्सा शिक्षा विभाग के पास जमा हैं, जिसके अभाव में वे मध्य प्रदेश या देश के किसी भी अन्य राज्य में प्रैक्टिस या नौकरी करने में पूरी तरह असमर्थ हैं, क्योंकि इसके लिए चिकित्सा संचालनालय से अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) की अनिवार्यता होती है।

    लोन की ईएमआई और शादी रुकने की बड़ी परेशानी

    पीड़ित डॉक्टरों के अनुसार, इस प्रशासनिक शिथिलता का उनके व्यक्तिगत और व्यावसायिक जीवन पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है। डॉ. यश ने बताया कि उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा के लिए बैंक से एक बड़ा लोन लिया था, लेकिन नौकरी न मिल पाने के कारण अब वे उसकी मासिक किस्त (ईएमआई) चुकाने की स्थिति में भी नहीं हैं। इसके अलावा, मूल शैक्षणिक प्रमाण पत्र पास में न होने से उनके कई सहकर्मियों के वैवाहिक संबंध तक टूट रहे हैं या अटक गए हैं। डॉक्टरों का कहना है कि वे देश में जहां कहीं भी रोजगार या निजी अस्पतालों में साक्षात्कार के लिए जाते हैं, वहां सबसे पहले मूल दस्तावेजों की मांग की जाती है, जिन्हें प्रस्तुत न कर पाने के कारण उन्हें बैरंग लौटना पड़ता है।

    विभागों की आपसी खींचतान और अदालती आदेश

    इस गंभीर संवेदनशील मामले पर सरकारी महकमों में आपसी तालमेल का घोर अभाव देखने को मिल रहा है। चिकित्सा शिक्षा विभाग का तर्क है कि बॉन्ड और पोस्टिंग से जुड़ा यह पूरा मामला सीधे तौर पर स्वास्थ्य विभाग के अधिकार क्षेत्र में आता है। इस प्रशासनिक खींचतान के बीच सरकार की ओर से अभी तक कोई भी आधिकारिक स्पष्टीकरण या राहत भरा बयान सामने नहीं आया है। अपनी डिग्रियों की वापसी के लिए संघर्ष कर रहे डॉक्टरों का कहना है कि इस विषय पर उच्च न्यायालय का भी स्पष्ट दिशा-निर्देश है, जिसके तहत यदि किसी डॉक्टर को कोर्स पूरा होने के बाद तीन महीने के भीतर बॉन्ड आधारित सरकारी पोस्टिंग नहीं दी जाती है, तो वह बॉन्ड स्वतः ही निरस्त माना जाएगा। इसके बावजूद अधिकारी डिग्रियां लौटाने में आनाकानी कर रहे हैं।

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