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    BSP में आकाश आनंद की भूमिका पर सवाल, आखिर क्यों नहीं मिली कोई बड़ी जिम्मेदारी?

    लखनऊ: बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनजर अपनी सांगठनिक और चुनावी रणनीतियों को धार देना शुरू कर दिया है। इसी कड़ी में विभिन्न विधानसभा सीटों पर उम्मीदवारों के चयन और स्क्रीनिंग की प्रक्रिया भी युद्ध स्तर पर चल रही है। हालांकि, इस पूरे चुनावी घटनाक्रम के बीच पार्टी के भीतर एक बड़ा सस्पेंस भी गहरा गया है। बसपा के राष्ट्रीय संयोजक आकाश आनंद की चुनावी और संगठनात्मक निर्णयों में किसी भी तरह की सक्रिय भूमिका दिखाई न देने से कैडर और जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच ऊहापोह की स्थिति बनी हुई है। खुद बसपा सुप्रीमो मायावती द्वारा भी अब तक आकाश आनंद की भावी भूमिका को लेकर पार्टी स्तर पर स्थिति स्पष्ट नहीं की गई है, जिससे असमंजस और बढ़ गया है।

    पार्टी के रणनीतिकारों और आंतरिक सूत्रों का मानना है कि उत्तर प्रदेश की मौजूदा जमीनी राजनीति में आकाश आनंद की अनुपस्थिति या निष्क्रियता से बसपा को चुनावी मोर्चे पर नुकसान उठाना पड़ सकता है। भले ही आकाश आनंद के पास प्रत्यक्ष रूप से चुनाव लड़ने का अनुभव न हो, लेकिन वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के मुखिया और सांसद चंद्रशेखर आजाद के बढ़ते सियासी प्रभाव का मुकाबला करने के लिए बसपा को एक मजबूत और आक्रामक युवा चेहरे की सख्त जरूरत है।

    गौरतलब है कि लोकसभा चुनाव के दौरान एक नाटकीय घटनाक्रम में जब आकाश आनंद की पार्टी पदों पर वापसी हुई थी, तब उन्हें उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की प्रत्यक्ष राजनीति से दूर रखने की आंतरिक रूप से सहमति बनी थी। हिंदी पट्टी के इन दो सबसे प्रमुख राज्यों में, जहां कभी बहुजन समाज पार्टी का सबसे मजबूत कोर जनाधार रहा है, वहां आकाश को किसी बड़ी जिम्मेदारी से महरूम रखना पार्टी के भविष्य और चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकता है।

    सोशल इंजीनियरिंग के लिए कद्दावर ब्राह्मण चेहरों की तलाश

    दूसरी तरफ, साल 2007 के अपने ऐतिहासिक 'सोशल इंजीनियरिंग' (ब्राह्मण-दलित गठजोड़) के फॉर्मूले को दोबारा जीवित कर उत्तर प्रदेश की सत्ता में वापसी का ख्वाब देख रही बसपा के सामने इस समय बड़े ब्राह्मण नेताओं का संकट खड़ा है। वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में अब तक किसी भी अन्य प्रमुख दल के बड़े या कद्दावर ब्राह्मण चेहरे ने बसपा का दामन नहीं थामा है। फिलहाल पार्टी की सदस्यता ग्रहण करने वाले नए चेहरों में सबसे बड़ी संख्या मुस्लिम और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के नेताओं की ही है।

    2007 की तुलना में बिखरा सतीश चंद्र मिश्रा का कुनबा, माधोगढ़ से नई शुरुआत

    संसदीय इतिहास गवाह है कि वर्ष 2007 में जब मायावती ने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी, तब बसपा खेमे में ब्राह्मण नेताओं की एक लंबी कतार मौजूद थी। उस दौर में पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा के परिवार और सगे-संबंधियों के ही करीब एक दर्जन से ज्यादा रसूखदार चेहरे सीधे बसपा से जुड़े हुए थे और संगठन में मजबूत पकड़ रखते थे। हालांकि, समय बदलने के साथ अब इस कुनबे से केवल सतीश चंद्र मिश्रा ही पार्टी में सक्रिय बचे हैं।

    इस कमी को पाटने और ब्राह्मण समाज के बीच अपनी गंभीर पैठ साबित करने के लिए बहुजन समाज पार्टी ने आगामी विधानसभा चुनाव के लिए जालौन जिले की माधोगढ़ सीट से आशीष पांडेय को अपना पहला आधिकारिक उम्मीदवार घोषित कर दिया है। इस टिकट वितरण के जरिए बसपा ने एक बार फिर ब्राह्मण मतदाताओं को साधने की बड़ी कवायद शुरू की है। पार्टी आलाकमान की ओर से यह संकेत भी दिए गए हैं कि आने वाले दिनों में सामान्य सीटों पर बड़ी संख्या में ब्राह्मण समाज के उम्मीदवारों को तरजीह दी जाएगी।

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