बस्तर| छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल में ग्रामीण महिलाओं के स्वावलंबन, सामाजिक चेतना और सशक्तिकरण के लिए पिछले साढ़े तीन दशकों से निरंतर संघर्ष करने वाली पद्मश्री से अलंकृत प्रख्यात समाजसेवी डॉ. बुधरी ताती ने अपने त्याग, सेवा और अडिग समर्पण की दास्तान साझा की है। देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के कर-कमलों द्वारा पद्मश्री पुरस्कार से नवाजे जाने के बाद प्रांतीय राजधानी रायपुर आगमन पर डॉ. ताती ने एक विशेष साक्षात्कार में अपनी इस गौरवशाली यात्रा के अनुभव बताए। बस्तर के सुदूर ग्रामीण आंचल से निकलकर देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक को हासिल करने वाली डॉ. बुधरी ताती ने साझा किया कि उनका मन बाल्यकाल से ही अध्यात्म की ओर आकर्षित था, जिसे आगे चलकर उन्होंने जनसेवा के महायज्ञ में बदल दिया।
पद्मश्री पुरस्कार बस्तर की हर ग्रामीण नारी का सम्मान
डॉ. बुधरी ताती ने भावुक होते हुए कहा कि उन्होंने कभी स्वप्न में भी यह नहीं सोचा था कि एक दुर्गम गांव में साधारण जीवन जीने वाली महिला को देश के इस सर्वोच्च शिखर सम्मान से सम्मानित किया जाएगा। उन्होंने इस बड़ी उपलब्धि के लिए केंद्र व राज्य शासन का दिल से आभार जताते हुए कहा कि यह गौरव सिर्फ उनका व्यक्तिगत सम्मान नहीं है, अपितु उन तमाम ग्रामीण और आदिवासी महिलाओं की जीत है, जिनके कल्याण के लिए उन्होंने अपना जीवन समर्पित कर दिया। यह राष्ट्रीय सम्मान समूचे छत्तीसगढ़ की नारी शक्ति को आगे बढ़ने के लिए नई ऊर्जा देगा।
ईरानार गांव से शुरू हुआ आध्यात्मिक और सेवा का सफर
अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए डॉ. ताती ने बताया कि उनका जन्म बस्तर के ईरानार गांव में हुआ था। छोटी उम्र से ही उनका मन पूजा-पाठ और आध्यात्मिक साधना में रमता था। मात्र 8-9 साल की अल्पायु में ही वे गुमरगुंडा स्थित दिव्य जीवन संघ से जुड़ गई थीं, जहाँ उन्हें श्रद्धेय गुरु लखमू बाबा का सानिध्य और बहुमूल्य मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। उन्होंने बताया कि इसी आध्यात्मिक परिवेश के बीच उनके अंतर्मन में यह चेतना जाग्रत हुई कि जब गुरु के उपदेश पूरे समाज को सही दिशा दिखा सकते हैं, तो वे खुद भी लोगों की जिंदगी सुधारने में अपना योगदान दे सकती हैं। इसी विचार ने उन्हें समाज सुधार की राह पर आगे बढ़ाया।
चुनौतीपूर्ण और अशांत क्षेत्रों में जलायी विकास की अलख
डॉ. बुधरी ताती ने बस्तर के उन बेहद संवेदनशील और अंदरूनी क्षेत्रों में जाकर जमीनी काम किया, जो लंबे समय तक नक्सली हिंसा और अशांति की चपेट में रहे। ऐसे कठिन और खौफजदा माहौल में भी उन्होंने हार नहीं मानी और महिलाओं को शिक्षित करने, उन्हें आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनाने तथा बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए लगातार काम किया। लगभग 35 वर्षों तक उन्होंने सुदूर गांवों में घूम-घूमकर साक्षरता, स्वास्थ्य, स्वच्छता और आत्मरक्षा के प्रति जागरूकता अभियान चलाया, जिससे आज हजारों आदिवासी परिवारों के जीवन में बड़ा बदलाव आया है।
नारी उत्थान को ही बनाया अपने जीवन का मुख्य लक्ष्य
डॉ. ताती का दृढ़ विश्वास है कि जब तक देश की आधी आबादी यानी महिलाएं सशक्त नहीं होंगी, तब तक किसी भी समाज या राष्ट्र की उन्नति की कल्पना नहीं की जा सकती। यही वजह रही कि उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी ग्रामीण और वनवासी क्षेत्र की बहनों का जीवन स्तर ऊंचा उठाने में लगा दी। उन्होंने शिक्षा को महिलाओं का सबसे अचूक हथियार बताते हुए कहा कि जब एक महिला शिक्षित और आत्मनिर्भर बनती है, तो वह पूरे परिवार और समाज को प्रगति के पथ पर ले जाती है।
सीमित संसाधनों के बावजूद युवाओं के लिए बनीं आदर्श
आज पद्मश्री डॉ. बुधरी ताती का पूरा जीवन संघर्ष, अटूट निष्ठा और सेवा की एक जीती-जागती मिसाल बन चुका है। उनकी यह बेमिसाल यात्रा इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि यदि आपके इरादे नेक हों और लक्ष्य समाज कल्याण का हो, तो रास्ते की कठिन परिस्थितियाँ और सीमित साधन कभी आपकी सफलता को नहीं रोक सकते। बस्तर की पावन धरा से निकलकर देश के सर्वोच्च पटल पर चमकने वाली डॉ. बुधरी ताती आज देश के लाखों युवाओं और महिलाओं के लिए प्रेरणा का एक महान पुंज हैं।


