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    मिशन सच इंटरव्यू : यूथ अवार्ड से सम्मानित आरुषि ने कहा, लड़का बाहर खेलेगा , लड़की रसोई में हाथ बंटाएगी यह नहीं चाहिए

    यूथ अवार्ड से सम्मानित आरुषि ने कहा, लड़का बाहर खेलेगा , लड़की रसोई में हाथ बंटाएगी यह नहीं चाहिए , इंटरव्यू सुनने के लिए क्लिक करें – https://youtu.be/AOfu01KW1-8?si=QJUScZOoVIt8CKuH
    आरुषि मित्तल प्रमुख शिक्षा और सामाजिक कार्यकर्ता हैं, जो ग्रामीण समुदायों में शिक्षा और लैंगिक समानता के लिए काम कर रही हैं। उन्होंने अलवर जिले में युवाओं के साथ लैंगिक हिंसा के खिलाफ और शिक्षा की जागरूकता पर सराहनीय काम किया, जिसके लिए उन्हें ‘नेशनल यूथ अवार्ड’ से सम्मानित किया गया। इसके बाद, उन्होंने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से शिक्षा में उच्च डिग्री प्राप्त की। वर्तमान में वे आधुनिक शिक्षण और सामाजिक समानता को बढ़ावा दे रही हैं।

    मिशन सच संपादक राजेश रवि से बातचीत 

    प्रश्न: जेंडर इक्वलिटी है क्या? क्या यह केवल महिलाओं के अधिकारों का विषय है?
    उत्तर: यही सबसे बड़ी गलतफहमी है। लोग “जेंडर इक्वलिटी” सुनते ही इसे महिलाओं के मुद्दे में बांध देते हैं, जबकि सच यह है कि इसका दायरा पूरे समाज तक फैला है। जेंडर इक्वलिटी का मतलब है ऐसा समाज, जहां हर व्यक्ति, चाहे वह महिला हो या पुरुष, अपनी क्षमता, अपनी पसंद और अपने व्यक्तित्व के आधार पर जिए, न कि इस आधार पर कि उसका जन्म किस जेंडर में हुआ।
    और इसे समझने के लिए पहले “जेंडर” को समझना जरूरी है। जेंडर कोई जैविक सच्चाई नहीं, बल्कि समाज की गढ़ी हुई धारणाएं हैं । जैसे यह मान लेना कि लड़कियों को गुलाबी रंग ही पसंद होगा, या लड़के रोएंगे नहीं। ये नियम प्रकृति ने नहीं, हमने बनाए हैं। और जो हमने बनाया है, उसे बदला भी जा सकता है।
    प्रश्न: महिलाओं की आजादी और जेंडर इक्वलिटी के बीच क्या संबंध है?
    उत्तर: बहुत सीधा संबंध है। अगर एक पुरुष रात के दो बजे भी बेखौफ सड़क पर निकल सकता है, तो यही अधिकार महिला को भी मिलना चाहिए । कोई शर्त नहीं, कोई “लेकिन” नहीं। सुरक्षित माहौल बनाना समाज और सरकार की जिम्मेदारी है, महिला की नहीं। अगर अपराध होता है, तो जिम्मेदार अपराधी है । पीड़िता नहीं। महिलाओं की आजादी को सीमित करना समाधान नहीं, बल्कि हार मान लेना है। असली समाधान अपराध को रोकने वाला माहौल बनाना है, न कि पीड़ितों को घरों में कैद करना।
    प्रश्न: जेंडर असमानता की शुरुआत कहां से होती है?
    उत्तर: घर से यानी वहीं से, जहां हम सबसे ज्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं। आज भी ज्यादातर घरों में लड़कों और लड़कियों के लिए मापदंड अलग हैं। लड़का बाहर खेलेगा, लड़की रसोई में हाथ बंटाएगी ,यह “परंपरा” नहीं, प्रशिक्षण है। और बच्चे हमारी नसीहतें नहीं सुनते, हमारा व्यवहार कॉपी करते हैं। इसलिए जब तक घर के भीतर बराबरी नहीं दिखेगी, समाज में बराबरी सिर्फ एक नारा बनकर रह जाएगी।
    प्रश्न: क्या कानूनों में महिलाओं को ज्यादा संरक्षण मिलने से असंतुलन पैदा हुआ है?
    उत्तर: जब ये कानून बने थे, तब समाज की सच्चाई अलग थी और महिलाओं को विशेष सुरक्षा की सख्त जरूरत थी । वे कानून जरूरी थे और आज भी अपनी जगह सही हैं। लेकिन कोई भी कानून पत्थर की लकीर नहीं होता, समाज बदलता है तो कानूनों की समीक्षा भी होनी चाहिए। अगर कहीं पुरुष भी उत्पीड़न झेल रहे हैं, तो न्याय व्यवस्था को वहां भी उतनी ही संवेदनशीलता दिखानी चाहिए। समानता का मतलब किसी एक पक्ष को जिताना नहीं है समानता का मतलब है हर पक्ष के लिए न्याय।
    प्रश्न: कार्यस्थलों पर महिलाओं को सबसे बड़ी चुनौतियां क्या दिखाई देती हैं?
    उत्तर: महिलाएं अक्सर अल्पसंख्यक होती हैं। और उसी दबाव में उन्हें अपने पहनावे से लेकर अपनी राय रखने तक में समझौता करना पड़ता है। फब्तियां, अभद्र टिप्पणियां, “सिर्फ मजाक” के नाम पर लैंगिक पूर्वाग्रह । यह सब इतना आम कर दिया गया है कि महिलाएं शिकायत करने से पहले सौ बार सोचती हैं, क्योंकि नौकरी बचानी होती है। यह चुप्पी असमानता का सबसे खतरनाक रूप है, क्योंकि यह दिखती नहीं, बस महसूस होती है।
    प्रश्न: प्राथमिक शिक्षा में क्या बदलाव जरूरी हैं?
    उत्तर: स्कूल वह पहली जगह होनी चाहिए जहां बच्चा बिना डर के अपनी बात कह सके । चाहे वह डर हो या दुख। लड़कियों को आत्मविश्वास चाहिए, लड़कों को अपनी भावनाएं व्यक्त करने की इजाजत चाहिए। और शिक्षकों को खुद स्टीरियोटाइप से बचना होगा । अगर बच्चे हमेशा पुरुष शिक्षक को सख्त और महिला शिक्षक को कोमल ही देखेंगे, तो वही सांचा उनके दिमाग में बैठ जाएगा, और फिर उसे तोड़ना मुश्किल हो जाएगा।
    प्रश्न: पाठ्यपुस्तकों में भी बदलाव की जरूरत है?
    उत्तर: बिल्कुल, और तुरंत। आज भी किताबों में मां का मतलब रसोई और पिता का मतलब सिर्फ कमाई है। शिक्षा का काम समाज की तस्वीर उतारना नहीं, बेहतर समाज गढ़ना है। बच्चों को ऐसे उदाहरण चाहिए जो उन्हें सिखाएं कि कोई भी जिम्मेदारी । चाहे कमाना हो या घर संभालना । किसी एक जेंडर की बपौती नहीं है।
    प्रश्न: क्या सरकार इस दिशा में पर्याप्त प्रयास कर रही है?
    उत्तर: स्कूल नामांकन बढ़ा है, अलग शौचालय बने हैं, सैनिटरी पैड जैसी बुनियादी सुविधाएं पहुंची हैं यह दिखाता है कि सरकार गंभीर है। लेकिन सच यह भी है कि सिर्फ योजनाओं से सोच नहीं बदलती। परिवार, स्कूल, मीडिया और समाज । इन सबको एक साथ, एक ही दिशा में चलना होगा। अकेली सरकार यह लड़ाई नहीं जीत सकती।
    प्रश्न: समाज के लिए आपका सबसे बड़ा संदेश क्या होगा?
    उत्तर: जेंडर इक्वलिटी महिलाओं बनाम पुरुषों की जंग नहीं है । यह उस समाज की नींव है जहां हर इंसान को बराबर मौका और बराबर आजादी मिले। हमें बच्चों को यह नहीं सिखाना कि “अच्छा लड़का” या “अच्छी लड़की” कैसे बनें हमें उन्हें सिखाना है कि एक अच्छा इंसान कैसे बनें। जिस दिन घर, स्कूल और समाज मिलकर यह सबक देंगे, उसी दिन असली बदलाव आएगा। जेंडर इक्वलिटी किसी एक वर्ग का एजेंडा नहीं यह एक संवेदनशील, सुरक्षित और न्यायपूर्ण समाज की न्यूनतम शर्त है, और इससे कम पर समझौता नहीं होना चाहिए।

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