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    MSP खरीद पर हाईकोर्ट सख्त: राजस्थान में किसानों के नुकसान पर केंद्र-राज्य से जवाब तलब

    MSP खरीद व्यवस्था पर उठे सवाल, अधिसूचित फसलों की खरीद नहीं होने का कारण बताने के निर्देश; 30 जुलाई को अगली सुनवाई

    जयपुर। राजस्थान उच्च न्यायालय ने न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर अधिसूचित कृषि उपज की खरीद नहीं होने से किसानों को हो रहे आर्थिक नुकसान के मामले में केंद्र सरकार, राजस्थान सरकार और संबंधित एजेंसियों से जवाब मांगा है। न्यायालय ने निर्देश दिए हैं कि सरकारें यह स्पष्ट करें कि घोषित MSP पर फसलों की प्रभावी खरीद क्यों नहीं हो रही और इसके लिए आवश्यक आधारभूत ढांचा क्यों विकसित नहीं किया गया।

    कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा एवं न्यायमूर्ति मनीष शर्मा की खंडपीठ ने जनहित याचिका संख्या 11407/2018 पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। सुनवाई के दौरान न्यायालय द्वारा नियुक्त न्याय मित्र अधिवक्ता प्रदीप चौधरी तथा याचिकाकर्ता रामपाल जाट से भी न्यायालय ने विस्तृत जानकारी प्राप्त की।

    खंडपीठ ने राजस्थान सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता गुरचरण सिंह गिल, भारत सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल भरत व्यास तथा नेफेड (NAFED) को लिखित जवाब प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने पूछा है कि अधिसूचित फसलों की खरीद नहीं होने तथा खरीद के लिए पर्याप्त आधारभूत ढांचा विकसित नहीं करने के क्या कारण हैं।

    MSP को कानूनी गारंटी बनाने की मांग

    याचिकाकर्ता रामपाल जाट की ओर से अदालत में आग्रह किया गया कि राजस्थान कृषि उपज मंडी अधिनियम, 1961 की धारा 9(2)(XII) में संशोधन कर न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद को अनिवार्य बनाया जाए। साथ ही चीनी उद्योग की तर्ज पर MSP को कानूनी खरीद गारंटी का स्वरूप देने की मांग भी रखी गई।

    इसके अतिरिक्त वेयरहाउसिंग विकास एवं विनियमन अधिनियम, 2007 तथा वर्ष 2010 के नियमों के प्रभावी क्रियान्वयन के तहत किसानों को बाजार भाव MSP से कम होने की स्थिति में गोदामों में उपज गिरवी रखकर निर्धारित ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध कराने के लिए मजबूत तंत्र विकसित करने की भी मांग की गई।

    बाजरा, चना और मक्का खरीद पर सवाल

    याचिका में कहा गया कि राजस्थान में वर्ष 2012 के बाद बाजरे की खरीद प्रभावी ढंग से नहीं हो सकी, जबकि मक्का, मूंग और चना जैसी फसलों की खरीद भी पर्याप्त नहीं होने से किसानों को लगातार MSP से कम कीमत पर उपज बेचनी पड़ रही है।

    सुनवाई के दौरान यह भी बताया गया कि खाद्यान्न खरीद के लिए भारतीय खाद्य निगम (FCI) तथा दलहन-तिलहन खरीद के लिए नेफेड और राजफैड के पास अधिकतम 90 दिन तक खरीद का प्रावधान होने के बावजूद अधिकांश स्थानों पर वास्तविक खरीद अवधि केवल 60 से 65 दिन ही रहती है, जिससे किसानों को नुकसान उठाना पड़ता है।

    याचिका में यह भी उल्लेख किया गया कि इस वर्ष चना खरीद के लिए नेफेड और एनसीसीएफ के पास शत-प्रतिशत खरीद की मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) होने के बावजूद राजस्थान में खरीद नगण्य रही और किसानों को मजबूरी में समर्थन मूल्य से कम दर पर उपज बेचनी पड़ी।

    FCI और राजफैड को भी बनाया पक्षकार

    उच्च न्यायालय ने गेहूं, बाजरा और मक्का जैसे खाद्यान्नों की खरीद के लिए भारतीय खाद्य निगम (FCI) तथा दलहन एवं तिलहन की खरीद के लिए राजफैड को भी पक्षकार बनाने के आदेश दिए हैं।

    गौरतलब है कि इसी जनहित याचिका पर वर्ष 2019 में तत्कालीन खंडपीठ ने केंद्र एवं राज्य सरकार से MSP खरीद नीति के संबंध में सुझाव मांगे थे। लंबे समय से जवाब लंबित रहने के बाद अब न्यायालय ने अंतिम अवसर देते हुए सभी पक्षों को लिखित उत्तर प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।

    मामले की अगली सुनवाई 30 जुलाई 2026 को होगी।

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