कोलकाता। पश्चिम बंगाल की सियासत में एक बार फिर बड़ा उलटफेर देखने को मिल रहा है, जहां भारत निर्वाचन आयोग द्वारा खाली हुई तीन राज्यसभा सीटों पर उपचुनाव के एलान के साथ ही सियासी पारा चढ़ गया है। इस पूरे घटनाक्रम का सबसे रोचक पहलू यह है कि इस चुनावी प्रक्रिया के बाद भी दिल्ली के उच्च सदन में जाने वाले चेहरे बदलने की उम्मीद नहीं है, बल्कि केवल उन चेहरों के राजनीतिक दल का बैनर बदलने जा रहा है। भारतीय जनता पार्टी इन तीनों सीटों को अपने पाले में करने के लिए पूरी तरह आश्वस्त दिख रही है, जबकि दूसरी ओर अंदरूनी खींचतान और टूट के दौर से गुजर रही तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) पर संसद में अपनी धमक खोने का बड़ा संकट मंडरा रहा है।
दल बदलते ही मिला चुनावी टिकट
दरअसल, यह पूरी सियासी हलचल तब शुरू हुई जब टीएमसी के तीन प्रमुख पूर्व राज्यसभा सांसदों—सुखेंदु शेखर राय, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बड़ाइक ने विधानसभा चुनावों में पार्टी की करारी शिकस्त के बाद शीर्ष नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए अपने पदों और पार्टी से इस्तीफा दे दिया था। इन तीनों कद्दावर नेताओं ने भाजपा का दामन थाम लिया और भगवा खेमे ने भी बिना वक्त गंवाए इन तीनों को ही आगामी उपचुनाव के लिए अपना रणबांकुरा घोषित कर दिया। संसदीय नियमावली के लिहाज से सुखेंदु शेखर राय और प्रकाश चिक बड़ाइक का कार्यकाल सितंबर 2029 तक और सुष्मिता देव का कार्यकाल अप्रैल 2030 तक का बचा हुआ था, लेकिन अब आगामी 24 जुलाई को होने वाले उपचुनाव में ये तीनों नेता पुरानी सीटों पर नई पार्टी के सिंबल के साथ दोबारा किस्मत आजमाएंगे।
विधानसभा के समीकरणों में भाजपा का दबदबा
अगर बंगाल विधानसभा के मौजूदा संख्या बल पर नजर डालें, तो पूरा खेल एकतरफा रूप से भाजपा के पक्ष में खड़ा दिखाई देता है। कुल 294 सीटों वाली विधानसभा में इस समय भाजपा के पास अपने 208 विधायकों का मजबूत आधार है। राज्यसभा उपचुनाव की तय मतदान प्रणाली के अनुसार, तीन अलग-अलग सीटों के इस मुकाबले में किसी भी प्रत्याशी को फतह हासिल करने के लिए करीब 70 मतों की दरकार होगी। भाजपा के पास विधायकों का इतना बड़ा आंकड़ा मौजूद है कि वह बिना किसी बाहरी बैसाखी के अपने तीनों ही उम्मीदवारों को क्रमशः 70, 69 और 69 वोट दिलाकर आसानी से संसद भेज सकती है, जिससे उनकी जीत तय मानी जा रही है।
अंदरूनी कलह से बेबस हुई टीएमसी
भाजपा के इस मजबूत चक्रव्यूह के आगे तृणमूल कांग्रेस के पास फिलहाल कोई ठोस काट नजर नहीं आ रही है। वैसे तो टीएमसी के सिंबल पर चुनाव जीते विधायकों की संख्या अभी भी लगभग 80 के आसपास है, जो एक सीट पर कड़ी टक्कर देने के लिए काफी थी, लेकिन पार्टी के भीतर मचे घमासान ने इसे बेहद पंगु बना दिया है। टीएमसी के विधायक इस समय दो फाड़ हो चुके हैं, जिसमें से एक धड़ा ममता बनर्जी के निर्देश पर चल रहा है, तो दूसरा बड़ा बागी गुट विधानसभा में विपक्ष के नेता रीताब्रत बनर्जी के झंडे तले लामबंद है। बागी धड़े का दावा है कि उनके साथ 65 के करीब विधायक हैं, जिसके कारण दोनों गुटों में किसी भी आम सहमति की संभावना पूरी तरह खत्म हो गई है।
गद्दारी बनाम नेतृत्व पर अविश्वास की जंग
इस सियासी नुकसान पर ममता बनर्जी का वफादार खेमा डैमेज कंट्रोल में जुटा है और इसे संकट के समय की गई 'गद्दारी' करार दे रहा है। उनका तर्क है कि ये सीटें टीएमसी की संगठनात्मक ताकत की वजह से जीती गई थीं और जनता इस दलबदल को देख रही है। वहीं दूसरी तरफ, बगावती सुर अख्तियार करने वाले नेताओं का कहना है कि यह कोई सामान्य दलबदल नहीं बल्कि नेतृत्व की गलत नीतियों के खिलाफ उपजा भारी अविश्वास है। फिलहाल, टीएमसी के नाम, चुनाव चिह्न और मूल संगठन पर वर्चस्व की यह कानूनी लड़ाई चुनाव आयोग की दहलीज पर है, लेकिन अगर 24 जुलाई के चुनाव में भाजपा बाजी मार लेती है, तो राज्यसभा में एनडीए की ताकत और बढ़ जाएगी।


