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    ऑपरेशन सिंदूर में सायरन खरीद पर सवाल, 5900 की मशीन 30 हजार में खरीदी का आरोप

    सिरसा। भारत-पाकिस्तान सीमा पर आपातकालीन परिस्थितियों में ग्रामीणों को सचेत करने के लिए की गई सायरन खरीद में एक बड़े वित्तीय घोटाले का मामला प्रकाश में आया है। 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान सुरक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से की गई इस सरकारी खरीद में भारी अनियमितताओं की बू आ रही है। इस पूरे संदिग्ध सौदे की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन ने उच्च स्तरीय जांच शुरू कर दी है, जिसमें शुरुआती स्तर पर ही चौंकाने वाले तथ्य सामने आने लगे हैं।

    सायरन खरीद में सामने आई वित्तीय हेराफेरी और कीमतों का बड़ा अंतर

    उपमंडल मजिस्ट्रेट (एसडीएम) स्तर पर चल रही इस जांच में यह बात खुलकर सामने आई है कि एक ही प्रकार और समान क्षमता के उपकरणों के लिए दो अलग-अलग सरकारी निकायों द्वारा अलग-अलग कीमतें चुकाई गईं। जहां सिरसा जिले की मीरपुर ग्राम पंचायत ने पूरी पारदर्शिता बरतते हुए एक सायरन माल एवं सेवा कर (जीएसटी) समेत महज उनसठ सौ रुपये में हासिल कर लिया, वहीं इसके विपरीत बड़ागुढ़ा पंचायत समिति ने इसी प्रकार के सायरन के लिए सरकारी खजाने से प्रति सायरन तीस हजार रुपये की भारी-भरकम राशि का भुगतान कर दिया।

    दिल्ली की फर्म को किया गया लाखों रुपये का संदिग्ध भुगतान

    जांच के दायरे में आई बड़ागुढ़ा पंचायत समिति ने इन सायरनों की आपूर्ति के लिए दिल्ली की एक निजी व्यापारिक फर्म का चयन किया था। रिकॉर्ड के मुताबिक, इस पूरी प्रक्रिया के दौरान कुल अड़तालीस सायरनों की खरीद दिखाई गई, जिसके एवज में सरकारी कोष से जीएसटी सहित लगभग सत्रह लाख रुपये की मोटी रकम संबंधित फर्म के खाते में ट्रांसफर कर दी गई। बाजार मूल्य से कई गुना अधिक कीमत पर की गई इस संदिग्ध खरीदारी ने पूरी टेंडर प्रक्रिया और अधिकारियों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

    दर्जनों ग्राम सचिवों ने लिखित में दी सायरन न मिलने की गवाही

    इस पूरे मामले में सबसे बड़ा और चौंकाने वाला मोड़ तब आया जब धरातल पर सामान की आपूर्ति की जांच की गई। पंचायत विभाग की पड़ताल के दौरान क्षेत्र के बयालीस ग्राम सचिवों ने आधिकारिक तौर पर लिखित प्रमाण देते हुए यह सनसनीखेज खुलासा किया कि वर्ष 2025-26 के दौरान उनकी संबंधित ग्राम पंचायतों को पंचायत समिति की तरफ से एक भी सायरन भौतिक रूप से प्राप्त नहीं हुआ है। कागजों पर लाखों रुपये खर्च होने के बावजूद जमीन पर सुरक्षा उपकरणों का गायब होना एक सुनियोजित साजिश की ओर इशारा करता है।

    प्रशासनिक स्तर पर दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की तैयारी

    कागजी आंकड़ों और जमीनी हकीकत में इतना बड़ा फासला मिलने के बाद प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मचा हुआ है। जांच अधिकारी अब उन सभी फाइलों और बिलों को खंगाल रहे हैं जिनके आधार पर इस पूरी राशि का भुगतान किया गया था। पुलिस और जिला प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े इस संवेदनशील अभियान के बजट में सेंध लगाने वाले अधिकारियों, कर्मचारियों और ठेकेदार फर्म के खिलाफ जालसाजी और गबन का मामला दर्ज कर सख्त कानूनी कार्रवाई अमल में लाई जाएगी।

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