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    62 साल पुराने बैंक पर मंडरा रहा बिक्री का खतरा, कनाडाई कंपनी ने दिखाई खरीदने में दिलचस्पी

    नई दिल्ली। देश के बैंकिंग क्षेत्र से इस वक्त की एक बेहद बड़ी और महत्वपूर्ण खबर सामने आ रही है। लंबे समय से चल रही अटकलों के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या भारत का एक बड़ा बैंक निजी हाथों में जाने वाला है और क्या कोई विदेशी कंपनी इसका अधिग्रहण करने जा रही है। दरअसल, आईडीबीआई बैंक (IDBI Bank) को लेकर बाजार में कयासों का दौर गर्म है क्योंकि ऐसी रिपोर्ट सामने आई हैं कि सरकार ने इस बैंक के रणनीतिक विनिवेश को अंतिम मंजूरी दे दी है। कई दौर की उच्च स्तरीय बैठकों और गहन विचार-विमर्श के बाद बैंक में बड़ी हिस्सेदारी बेचने का यह बड़ा फैसला लिया गया है, जिसने देश के वित्तीय क्षेत्र में एक नई बहस छेड़ दी है।

    क्या है विनिवेश और कैसे काम करती है इसकी प्रक्रिया

    आसान शब्दों में समझें तो विनिवेश यानी डिसइन्वेस्टमेंट का सीधा अर्थ अपनी संपत्ति या संचित हिस्सेदारी को बेचना अथवा उसे कम करना है। जब भी सरकार देश के किसी सार्वजनिक उपक्रम या सरकारी बैंक में अपने पास मौजूद शेयर्स को आम जनता, शेयर बाजार या किसी बड़ी निजी कंपनी को बेचकर राजस्व जुटाती है, तो इस पूरी वित्तीय प्रक्रिया को विनिवेश का नाम दिया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य सरकारी कंपनियों में सरकारी पूंजी को कम करके निजी क्षेत्र की भागीदारी और निवेश को बढ़ावा देना होता है।

    राजकोषीय घाटा सुधारने और विकास कार्यों के लिए जरूरी है यह कदम

    सरकार द्वारा किसी भी उपक्रम में अपनी हिस्सेदारी बेचने के पीछे कई बेहद ठोस वित्तीय कारण होते हैं। सरकार को देश में बुनियादी ढांचे जैसे सड़कों, आधुनिक अस्पतालों, स्कूलों और अन्य बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के निर्माण के साथ-साथ अपनी पुरानी देनदारियों को चुकाने के लिए एकमुश्त बड़ी रकम की आवश्यकता होती है। इसके अलावा, जब सरकार का खर्च उसकी कुल कमाई से अधिक हो जाता है, तो राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने के लिए विनिवेश एक मजबूत जरिया बनता है। साथ ही, निजी निवेशकों के आने से बैंक या कंपनी के प्रबंधन में बड़ा सुधार होता है और कार्यशैली अधिक पेशेवर हो जाती है।

    सरकार और एलआईसी मिलकर बेचेंगे अपनी बड़ी हिस्सेदारी

    वर्तमान में आईडीबीआई बैंक के मालिकाना हक की बात करें तो इसमें भारत सरकार और लाइफ इंश्योरेंस कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (LIC) की हिस्सेदारी सबसे मजबूत है, जो मिलकर कुल इक्विटी का लगभग 95 प्रतिशत हिस्सा संभालते हैं। इस रणनीतिक विनिवेश योजना के तहत दोनों पक्ष मिलकर बैंक का पूरा मैनेजमेंट कंट्रोल सौंपने के साथ कुल 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने की तैयारी में हैं। इस प्रस्तावित सौदे के अंतर्गत केंद्र सरकार अपनी 30.48 प्रतिशत हिस्सेदारी का सौदा करेगी, जबकि जीवन बीमा निगम अपनी 30.24 प्रतिशत हिस्सेदारी बाजार में बेचेगा।

    कनाडाई कंपनी फेयरफैक्स रेस में सबसे आगे

    इस बहुचर्चित बैंक को खरीदने और इसके अधिग्रहण की रेस में एक बड़ी विदेशी फर्म का नाम सबसे आगे चल रहा है। कनाडाई मूल की दिग्गज वित्तीय कंपनी 'फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स' इस हिस्सेदारी को खरीदने के लिए मुख्य दावेदार के रूप में उभरी है। फेयरफैक्स इंडिया होल्डिंग्स ने इस प्रस्तावित सौदे के लिए अपना 'एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट' (EoI) भी दाखिल कर दिया है और वह बोली लगाने वाले रणनीतिक खरीदारों की सूची में शामिल है। यदि यह सौदा तय मानदंडों के अनुसार पूरा होता है, तो आईडीबीआई बैंक के पूर्ण निजीकरण का रास्ता पूरी तरह साफ हो जाएगा।

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