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    देवशयनी एकादशी से 4 माह तक सोते रहेंगे देवी-देवता, तो क्या नहीं होंगे व्रत, पूजा और उपवास? क्या कहते हैं नियम

    आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को देवशयनी एकादशी होती है. इस दिन से चातुर्मास का प्रारंभ होता है और इस सृष्टि के पालनकर्ता भगवान विष्णु योग निद्रा में चले जाते हैं. हिंदू कैलेंडर के अनुसार आषाढ़ शुक्ल एकादशी से लेकर कार्तिक शुक्ल एकादशी ​तक के चार माह देवी और देवताओं का शयन काल होता है. इस वजह से इसमें कोई शुभ कार्य नहीं करते हैं. शादी, मुंडन, गृह प्रवेश, भवन निर्माण, नया काम आदि नहीं करते हैं. सवाल यह है कि देवशयनी एकादशी से देवी और देवता योग​ निद्रा में चले जाएंगे तो क्या व्रत, पूजा, उपवास, मंत्र जाप आदि नहीं किए जाएंगे?
    देवशयनी एकादशी से व्रत, पूजा आदि पर रोक नहीं?

    देवशयनी एकादशी के अवसर पर जब भगवान विष्णु योग निद्रा में जाते हैं, तो उस दिन भी लोग व्रत रखकर श्रीहरि की पूजा करते हैं, मंत्र जाप, आरती, रात्रि जागरण आदि किया जाता है. देवशयनी एकादशी से शुरू होने वाले चातुर्मास में व्रत, पूजा, स्नान, दान, उपवास, त्योहार आदि पर कोई रोक नहीं होती है.

    चातुर्मास में शिव भक्तों की पूजा के लिए महादेव का सबसे प्रिय माह सावन आता है. इसके पूरे 30 दिन शिव पूजा के लिए महत्वपूर्ण होते हैं. सावन में हर दिन जलाभिषेक करके आप महादेव की कृपा पा सकते हैं और अपनी मनोकामनाएं पूरी कर सकते हैं.

    चातुर्मास में ही अखंड सौभाग्य प्रदान करने वाली हरतालिका तीज, हरियाली तीज आती है, जिसमें सुहागन महिलाएं व्रत रखकर माता पार्वती और शिव जी की पूजा करती हैं. भाई और बहन के प्रेम का सबसे बड़ा त्योहार रक्षाबंधन भी चातुर्मास में ही श्रावण पूर्णिमा को मनाते हैं.
    चातुर्मास में 10 दिनों का गणेशोत्सव मनाते हैं, जो गणेश चतुर्थी से लेकर अनंत चतुर्दशी तक चलती है. भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाई जाती है, वहीं कार्तिक अमावस्या को दिवाली का त्योहार होता है. चातुर्मास के 4 माह में एकादशी, प्रदोष, पूर्णिमा, अमावस्या, शिवरात्रि के व्रत आते हैं. इस तरह से देखा जाए तो चातुर्मास में सभी व्रत, त्योहार, पूजा पाठ आदि करते हैं, इन पर कोई रोक नहीं होती है.
    फिर चातुर्मास में क्यों नहीं होते शुभ काम?
    विवाह, गृह प्रवेश या अन्य शुभ कार्यों के लिए देव गुरु बृहस्पति के साथ भगवान विष्णु का जागृत अवस्था में होना जरूरी है. यदि ऐसा नहीं है तो आपको इन कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त नहीं मिलेंगे और आप अपने मन से कोई कार्य करते भी हैं तो उसका शुभ फल प्राप्त नहीं होगा. ऐसी धार्मिक मान्यता है.

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