लखनऊ: उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस के बीच गठबंधन के भीतर ही शह-मात का खेल शुरू हो गया है। दोनों प्रमुख विपक्षी दल सीट बंटवारे (सीट शेयरिंग) को लेकर एक-दूसरे पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की राजनीति में जुट गए हैं। सार्वजनिक मंचों और मीडिया बयानों के जरिए दोनों पार्टियां अपनी-अपनी राजनीतिक ताकत का अहसास करा रही हैं, ताकि टेबल टॉक (वार्ता) के दौरान वे बेहतर और मजबूत स्थिति में रह सकें। जहां एक ओर कांग्रेस गठबंधन के भीतर सम्मानजनक और बराबरी की हिस्सेदारी की मांग पर अड़ी है, वहीं समाजवादी पार्टी का पूरा जोर इस बात पर है कि सीटों का आवंटन केवल और केवल प्रत्याशी और क्षेत्र की 'जिताऊ क्षमता' (विनेबिलिटी) के पैमाने पर होना चाहिए।
चुनावी तैयारियों के बीच कांग्रेस का 150 सीटों पर दावा, सपा ने साधी चुप्पी
उत्तर प्रदेश के महामुकाबले में अब महज छह से सात महीने का बेहद कम समय बचा है, जिससे दोनों दलों के भीतर सीटों को लेकर बेचैनी बढ़ गई है। कांग्रेस रणनीतिकार इस बार सूबे में अपने बदले राजनीतिक कद का हवाला देते हुए गठबंधन के तहत 150 से अधिक सीटों पर अपना मजबूत दावा ठोक रहे हैं। इसके विपरीत, समाजवादी पार्टी का शीर्ष नेतृत्व फिलहाल सीटों की कोई निश्चित संख्या बताने से साफ बच रहा है। सपा का मानना है कि गठबंधन का व्यावहारिक आधार केवल वही सीटें होनी चाहिए, जहां विपक्षी उम्मीदवार की जीत शत-प्रतिशत तय हो। वहीं, कांग्रेस आलाकमान यह नैरेटिव सेट करने में जुटा है कि उसके साथ आने से ही सूबे के अल्पसंख्यक और दलित वोटों का पूर्ण ध्रुवीकरण (विपक्षी पाले में) संभव है। इसी दबाव की रणनीति के तहत कांग्रेस समय-समय पर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के साथ भी संभावित गठबंधन के पर्दे के पीछे से संकेत देती रही है, हालांकि बसपा सुप्रीमो ने ऐसे किसी भी कयास को कभी तवज्जो नहीं दी।
नेताओं की बयानबाजी से बढ़ी तल्खी, मर्यादा में रहने की दी गई नसीहत
इमरान मसूद का तीखा हमला: हाल ही में वरिष्ठ कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने एक विवादित बयान देकर इस खींचतान को जगजाहिर कर दिया था। उन्होंने कहा था कि साल 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा अपने दम पर 120 सीटों का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाई थी, जबकि 2024 के आम चुनाव में कांग्रेस का हाथ मिलते ही उसकी ताकत बढ़ी और वह 37 लोकसभा सीटें जीतने में कामयाब रही। मसूद अक्सर सपा पर मुस्लिम समुदाय के ज्वलंत मुद्दों को मुखरता से न उठाने का आरोप भी लगाते रहे हैं।
सपा का पलटवार: इस बयान पर तीखी आपत्ति जताते हुए सपा के राज्यसभा सांसद रामजी लाल सुमन ने करारा जवाब दिया। उन्होंने नसीहत देते हुए कहा कि कुछ नेता सुर्खियां बटोरने के लिए बेवजह के बयान देकर राजनीतिक मर्यादाएं भूल रहे हैं। सुमन ने साफ किया कि अगर गठबंधन को वास्तव में मजबूत रखना है, तो सार्वजनिक मंचों पर बड़बोलेपन से बचकर संयम और सौहार्द का माहौल बनाए रखना होगा।
'छोटे भाई' की भूमिका स्वीकार करने के मूड में नहीं देश की सबसे पुरानी पार्टी
उत्तर प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने पार्टी का रुख स्पष्ट करते हुए दो टूक शब्दों में कहा है कि वे विधानसभा चुनाव सम्मान और पूर्ण बराबरी के सिद्धांतों के आधार पर ही लड़ेंगे। राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बयान के जरिए कांग्रेस ने सपा को यह कड़ा संदेश दे दिया है कि वह इस बार उत्तर प्रदेश में खुद को 'छोटे भाई' की भूमिका में कतई स्वीकार नहीं करेगी। पार्टी आलाकमान सीट बंटवारे के मेज पर इसी बराबरी के फार्मूले को लागू कराने की पुरजोर कोशिश कर रहा है।
2022 के आंकड़ों का हवाला देकर सपा ने याद दिलाई जमीनी हकीकत
पुराना रिकॉर्ड: कांग्रेस के इन भारी-भरकम दावों पर पलटवार करते हुए समाजवादी पार्टी के रणनीतिकारों ने पुराने चुनावी आंकड़े सामने रख दिए हैं। सपा नेताओं का तर्क है कि साल 2017 के विधानसभा चुनाव में जब दोनों दल साथ थे, तब कांग्रेस को 107 सीटें दी गई थीं, लेकिन वह महज सात सीटों पर ही सिमट गई थी।
वोट शेयर का गणित: सपा का यह भी कहना है कि जब साल 2022 में कांग्रेस ने 'लड़की हूं, लड़ सकती हूं' के नारे के साथ अकेले चुनाव लड़ा, तो पूरे प्रदेश में उसे सिर्फ दो सीटों से संतोष करना पड़ा था। ऐसे में सपा का मानना है कि सत्तारूढ़ भाजपा को शिकस्त देने के लिए किसी भी दल को सीटों की संख्या की जिद छोड़ने की जरूरत है। संख्या बल पर अड़ने के बजाय दोनों दलों को केवल उम्मीदवार की जमीनी पकड़ और उसकी जीत की संभावना को ही सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी, तभी यह गठबंधन कारगर साबित हो सकेगा।


