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    अरशद मदनी के बयान से सियासत गरमाई, कांग्रेस की स्थापना को लेकर कही बड़ी बात

    नई दिल्ली। जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष अरशद मदनी ने कांग्रेस के गठन और देश की आजादी में उलेमाओं की भूमिका को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस की स्थापना का मूल उद्देश्य देश की स्वतंत्रता नहीं, बल्कि उस समय बढ़ रही हिंदू-मुस्लिम दरार को पाटना था। मदनी के अनुसार, 1857 की क्रांति और आजादी की अन्य लड़ाइयों के दौरान शहीद हुए स्वतंत्रता सेनानियों के व्यापक दबाव के बाद ही कांग्रेस ने अपने एजेंडे में आजादी को शामिल किया। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जब देश में कोई राजनीतिक दल अस्तित्व में नहीं था, तब देवबंद के उलेमाओं ने ही अंग्रेजों के विरुद्ध मोर्चा संभाला था।

    देश की एकता और फिरकापरस्ती पर प्रहार

    अरशद मदनी ने देश में बढ़ती सांप्रदायिक सौहार्द की कमी पर गहरी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि हम पिछले 1300 वर्षों से इस देश में रह रहे हैं, लेकिन वर्तमान के माहौल ने हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई समुदायों के बीच के रिश्तों को कमजोर कर दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका संगठन न तो चुनाव लड़ता है और न ही किसी को चुनाव लड़ाता है, लेकिन देश की तरक्की के लिए सभी समुदायों का एकजुट होना अनिवार्य है। उन्होंने उम्मीद जताई कि नफरत का यह दौर जल्द ही समाप्त होगा और देश पुनः एकता के पथ पर अग्रसर होगा।

    बुलडोजर कार्रवाई और नफरत की राजनीति

    मदनी ने हालिया समय में मस्जिदों और मदरसों के खिलाफ की गई 'बुलडोजर कार्रवाई' की कड़ी आलोचना की। उन्होंने जोर देकर कहा कि कोई भी देश लंबे समय तक घृणा और भय के आधार पर नहीं चल सकता; राष्ट्र का संचालन केवल प्रेम, करुणा और न्याय के माध्यम से ही संभव है। उन्होंने सरकार को आगाह किया कि सत्ताएं आती-जाती रहती हैं, लेकिन न्याय और मानवता की विरासत सर्वोपरि है। मदनी ने कहा कि आज हमारे बुजुर्गों द्वारा आजादी के लिए किए गए बलिदानों और उनसे जुड़ी निशानियों को मिटाने का प्रयास किया जा रहा है, जो कि अत्यंत खेदजनक है।

    आजादी के आंदोलन में उलेमाओं का बलिदान

    जमीयत उलेमा-ए-हिंद को आजादी के आंदोलन का एक 'सुनहरा अध्याय' बताते हुए अरशद मदनी ने कहा कि कई धार्मिक विद्वानों ने ब्रिटिश शासन के अत्याचारों को सहा, लंबी जेल की सजाएं काटीं और फांसी के फंदों को चूमा, लेकिन कभी झुककर माफी नहीं मांगी। उन्होंने शेखुल हिंद मौलाना महमूदुल हसन का विशेष उल्लेख किया, जिन्होंने ब्रिटिश गुलामी को गैर-कानूनी घोषित करते हुए उनकी अधीनता स्वीकार करने से साफ इनकार कर दिया था। मदनी का मानना है कि इन बलिदानों को इतिहास में वह स्थान नहीं मिला, जिसके वे हकदार थे, और आज की पीढ़ी को इनसे प्रेरणा लेने की आवश्यकता है।

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