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    कौन थे त्रिशूलिया बाबा? जिनकी तपस्या से मोहित हो जाते थे जंगली जानवर, जानें 300 साल पुरानी कहानी

    छतरपुर जिले में आज से 300 साल पहले एक ऐसे भी साधु रहे हैं जो अपने चमत्कार के लिए जाने जाते थे. दरअसल, जिले के लवकुश नगर की पर्यटन स्थल बंबरबेनी की पहाड़ी में 300 साल पहले त्रिशूलिया बाबा एक विशाल वृक्ष के नीचे तपस्या किया करते थे. ये इतने चमत्कारी थे कि जंगल-पहाड़ में रहने वाले जानवर भी इनके पास डेरा डालकर रहते थे. 8 दिन में एक बार ही नगर में भिक्षा मांगने आते थे. आज इनकी याद में उसी पेड़ के नीचे बड़े चबूतरे के साथ इनकी बड़ी सी मूर्ति स्थापित है. जहां लाखों श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं.

    300 साल पुराना स्थान आज भी मौजूद
    जगदीश नामदेव बताते हैं कि छतरपुर जिले के लवकुश नगर में त्रेतायुग की एक पहाड़ी है. जिसे आज मां बंबरबेनी पहाड़ी के नाम से जाना जाता है. आज से 300 साल पहले इस पहाड़ी में चढ़ने के लिए सीढ़ियां नहीं बनी थीं. उस समय इस पहाड़ी में चट्टानों से ही चढ़कर एक बाबा आकर यहां तपस्या किया करते थे. एक विशाल वृक्ष के नीचे तपस्या किया करते थे. वह त्रिशुलिया बाबा के नाम से प्रसिद्ध थे. वह पूरे लवकुश नगर के लिए आस्था के प्रतीक हैं.
    सोने की नगरी बनने का दिया आशीर्वाद
    जगदीश बताते हैं कि त्रिशुलिया बाबा 8 दिन में एक दिन के लिए पहाड़ से नीचे उतरकर पूरे नगर में भिक्षा मांगते थे और हमेशा यही आशीर्वाद देते थे कि लवकुश महाराज की ये नगरी सोने की हो जाएगी. जिस पहाड़ पर उन्होंने तपस्या की वही पहाड़ी आज आस्था का प्रतीक बनी हुई है. इस पहाड़ी पर मां बंबरबेनी यानी माता सीता का प्राचीन स्थान है. यहां सैकड़ों किमी दूर से भी लोग आते हैं.

    पहाड़ी में लालदास बाबा का भी स्थान
    जगदीश बताते हैं कि त्रिशुलिया बाबा घनघोर तपस्या करते थे. हमारे पूर्वज बताते हैं कि त्रिशुलिया बाबा के साथ एक और संत रहते थे जिनका नाम लाल दास बाबा था. इनका भी यहीं स्थान है. हालांकि, समिति जल्द ही उनका भी पक्का स्थान बनवाएगी. वह भी त्रिशुलिया बाबा जैसे ही तपस्वी थे. वर्षों तक पानी नहीं पीते थे. पत्ते खाकर रहते थे. वह अष्टांग योग सिद्ध संत थे.

    जंगली जानवर भी मोहित हो जाते थे
    हमारे पूर्वज बताते थे कि जब दोनों संत इस पहाड़ी पर तपस्या करते थे तो मोर आ जाते थे. इनकी आवाज में मौर और तमाम पक्षी भागे चले आते थे. हमने तो ये भी सुना है कि रात्रि में तेंदुआ और शेर भी आ जाते थे. लेकिन संत तपस्या करते रहते थे. आज भले ही नई पीढ़ी को इनके बारे में जानकारी न हो लेकिन हमने तो अपने पूर्वजों से बहुत कुछ सुन रखा है. हमने भले ही देखा नहीं है लेकिन

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