प्रवचन में गुरु का सम्मान, लोभ त्याग और अहिंसा पर दिया विशेष संदेश, जीवन को मोक्षमार्ग की ओर बढ़ाने का किया आह्वान
अलवर। जैन भवन मंदिर में आयोजित धर्मसभा में विराजमान मुनि श्री निश्चल सागर जी महाराज ने अपने प्रेरणादायी प्रवचन में कहा कि जीवन में देव, शास्त्र और गुरु का सदैव सम्मान करना चाहिए तथा ऐसा कोई भी कार्य नहीं करना चाहिए जिससे उनकी अवमानना हो। उन्होंने कहा कि जीवन में बहुत सी बातें भुला दी जाती हैं, लेकिन गुरु द्वारा दी गई शिक्षा कभी नहीं भूलनी चाहिए, क्योंकि वही जीवन को सही दिशा प्रदान करती है और आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है।
मुनि श्री ने कहा कि मनुष्य का वास्तविक उद्देश्य अपने जीवन को सार्थक बनाना है। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए श्रद्धालु गुरुजनों की वाणी सुनने आते हैं। गुरु का प्रत्येक उपदेश आत्मशुद्धि और मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर करने वाला होता है।
प्रवचन के दौरान उन्होंने लोभ को मनुष्य का बड़ा शत्रु बताते हुए कहा कि व्यक्ति को लोभ का त्याग करना चाहिए। लोभ के कारण ही मनुष्य अनेक प्रकार के पाप और दुखों में फंस जाता है। संयम, संतोष और सदाचार ही जीवन को श्रेष्ठ बनाते हैं।
मुनि श्री ने अपने प्रवचन को सरल उदाहरण के माध्यम से समझाते हुए कहा कि जिस प्रकार कुम्हार मिट्टी को रौंदकर और बाहर से थपकी देकर उसे सुंदर आकार देता है, उसी प्रकार गुरु भी अपने उपदेशों के माध्यम से मनुष्य के भीतर मौजूद अवगुणों और विकृतियों को दूर कर उसके व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं। गुरु की सीख कभी-कभी कठोर प्रतीत होती है, लेकिन उसका उद्देश्य केवल शिष्य का कल्याण होता है।
उन्होंने कहा कि जैन धर्म केवल बाहरी शुद्धता का संदेश नहीं देता, बल्कि अहिंसा, करुणा, संयम और आत्मशुद्धि का मार्ग दिखाता है। सच्चा जैन वही है जो अपने व्यवहार में अहिंसा को अपनाकर सभी जीवों के प्रति दया और मैत्री का भाव रखे।
प्रवचन के अंत में मुनि श्री निश्चल सागर जी महाराज ने सभी श्रद्धालुओं से गुरु की वाणी को जीवन में उतारने, लोभ का त्याग करने तथा अहिंसा और संयम के मार्ग पर चलकर अपने जीवन को सफल बनाने का आह्वान किया। बड़ी संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं ने श्रद्धाभाव के साथ धर्मसभा का लाभ प्राप्त किया।
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