मुंबई — शिवसेना (यूबीटी) ने अपने मुखपत्र 'सामना' के संपादकीय के माध्यम से केंद्र की सत्ता पर काबिज बीजेपी सरकार और उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। पार्टी ने आरोप लगाया है कि नीट-यूजी परीक्षा की धांधलियों के खिलाफ जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान छात्रों व आंदोलनकारियों को पानी और भोजन की व्यवस्था उपलब्ध कराने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं को राजनीतिक द्वेष के चलते अनावश्यक रूप से निशाना बनाया जा रहा है।
मोहम्मद जुनैद और उनके परिवार पर पुलिसिया कार्रवाई
संपादकीय में इस बात का दावा किया गया है कि उत्तर प्रदेश पुलिस ने सिर्फ सामाजिक कार्यकर्ता मोहम्मद जुनैद को ही नहीं, बल्कि उनके पूरे परिवार को भारी मानसिक प्रताड़ना दी है। पार्टी का आरोप है कि उनके माता-पिता, बहन और यहां तक कि ससुराल पक्ष के लोगों को भी बार-बार पुलिस थानों में तलब किया गया और उन्हें घंटों तक बैठाकर रखा गया, ताकि यह दबाव बनाया जा सके कि इस राहत अभियान के लिए वित्तीय सहायता कहां से आई थी।
राहत अभियानों को रोकने और बाधाएं डालने के आरोप
पार्टी ने संपादकीय में यह भी लिखा है कि प्रशासन ने आंदोलन को भीतर से कमजोर करने के लिए प्रदर्शनकारियों तक खानपान की सप्लाई रोकने के तमाम प्रयास किए। आसपास के ठेलों, होटलों और कैटरिंग सेवाओं को बंद करने के निर्देश दिए गए, लेकिन इसके बावजूद मोहम्मद जुनैद ने पैर में चोट होने के बावजूद स्थानीय सिख लंगरों की मदद से निरंतर जरूरतमंदों तक भोजन पहुंचाने का नेक कार्य जारी रखा।
राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों से ध्यान भटकाने का दावा
शिवसेना (यूबीटी) ने तीखा प्रहार करते हुए कहा कि सरकार अपनी मशीनरी का उपयोग मानवीय सहायता देने वालों की जांच में तो पूरी शिद्दत से कर रही है, परंतु राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े बड़े मामलों में वह पूरी तरह विफल रही है। संपादकीय में पहलगाम आतंकी हमले और पुलवामा की घटना का हवाला देते हुए कहा गया कि असली गुनहगारों और विस्फोटक सामग्री के स्रोतों का आज तक पता नहीं चल पाया है, जबकि पूरी जांच का रुख सिर्फ इस बात पर केंद्रित कर दिया गया है कि भोजन अभियान के लिए फंड कहां से आया।
तानाशाही के खिलाफ युवाओं का जीवंत संघर्ष
संपादकीय के अंत में जंतर-मंतर पर हुए इस आंदोलन को किसी विफल प्रदर्शन के बजाय 'तानाशाही के खिलाफ युवाओं का एक विशाल और जीवंत महोत्सव' करार दिया गया। पार्टी ने पर्यावरणविदों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं से अपील की है कि वे जमीनी स्तर पर काम करने वाले इन सामाजिक कार्यकर्ताओं के समर्थन में आगे आएं और सरकार की इस दमनकारी नीति के खिलाफ एकजुट होकर अपनी आवाज बुलंद करें।


