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    अपनों से दूर, आस्था भरपूर : करवा चौथ : अपना घर में 212 महिला प्रभुजियों ने रखा निर्जला व्रत

     

    उनके मन में यह भरोसा कायम है कि एक दिन उनके पति उन्हें लेने आश्रम आएंगे

     राजेश खण्डेलवाल, वरिष्ठ पत्रकार । 

    भरतपुर। रिश्ते केवल साथ रहने से नहीं, दिल से जुड़े रहने से जीवित रहते हैं। जीवन की परिस्थितियां किसी को अपनों से कितना भी दूर कर दें, मन में बसी प्रेम और समर्पण की भावना को मिटा पाना आसान नहीं होता। इसी प्रेम, विश्वास और उम्मीद की भावुक तस्वीर गुरुवार को भरतपुर के अपना घर आश्रम में देखने को मिली, जहां महिला प्रभुजियों ने अपने पतियों की लंबी उम्र की कामना के साथ करवाचौथ का निर्जला व्रत रखा।

    कभी किसी घर की रौनक रहीं, किसी परिवार की खुशियों का हिस्सा रहीं और किसी की जीवनसंगिनी बनकर उम्र भर साथ निभाने का सपना देखने वाली ये महिलाएं आज अपनों से दूर हैं। मानसिक व शारीरिक अस्वस्थता के कारण उन्हें परिवार से बिछडऩे के बाद अपना घर आश्रम में आश्रय लेना पड़ा, जो अब सेवा और उपचार के बीच जीवन बिता रही हैं पर उनके हृदय में अपने परिवार और पति के प्रति आज भी स्नेह भरपूर है। अपना घर आश्रम में इस समय 3,642 महिला प्रभुजी हैं। इनमें से 212 से अधिक महिला प्रभुजियों ने करवाचौथ का व्रत रखकर अपने पतियों के दीर्घायु की कामना की। यह आयोजन केवल एक धार्मिक पर्व का निर्वहन नहीं, बल्कि उन भावनाओं की अभिव्यक्ति थी, जो अपनों से दूर होने के बावजूद उनके मन में आज भी जीवित हैं।

    दिल में कसम, मन में अटूट विश्वास

    आश्रम में पिछले 12 वर्ष से रह रहीं प्रभुजी मंजू और 5 साल से करवा चौथ का व्रत रख रहीं प्रिया इस भावना की जीवंत मिसाल हैं। इतनी लंबी प्रतीक्षा के बाद भी उनके मन में यह भरोसा कायम है कि एक दिन उनके पति उन्हें लेने आश्रम आएंगे। यह छोटी-सी उम्मीद ही उनके जीवन का सबसे बड़ा सहारा है। इनकी आंखों में अपनों के लौटने की आस है, दिल में प्रेम की कसक है और मन में परमात्मा के प्रति अटूट विश्वास। वे मानती हैं कि ईश्वर के दरबार में देर हो सकती है, अंधेर नहीं।

    चंद्र दर्शन के बाद खोला उपवास

    महिला प्रभुजियों ने हाथों में मेहंदी लगाई, पारंपरिक शृंगार किया और चुनरी के परिधान पहने। दोपहर एक बजे उन्होंने एकत्र होकर चौथ माता की कथा सुनी। इसके बाद ढोलक की थाप पर सुहाग गीत, भजन और लोकगीत गूंजे और उन्होंने नृत्य कर पर्व की खुशियां साझा कीं। रात्रि में चंद्र दर्शन के बाद विधि-विधान से अघ्र्य अर्पित कर व्रत खोला।

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