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    अरावली पर संकट या भ्रम

    अरावली पर  सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उठे सवाल 

    राजेश रवि 

    अगर आप अरावली पर अपनी कोई राय रखते है तो 9649856000 पर वाट्सएप कर सकते है।आपकी बात missionsach.com पर प्रसारित की जा सकती है।

    यदि आज सजगता दिखाई गई, तो अरावली को बचाया जा सकता है, लेकिन यदि इसे केवल राजनीतिक बहस तक सीमित कर दिया गया, तो आने वाली पीढ़ियों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। अरावली का भविष्य अब फैसलों से ज्यादा नीयत और निगरानी पर निर्भर करता है।

    सवाल उठता है—असलियत क्या है और सच्चाई किसके पक्ष में है?

    राजेश रवि , लेखक मिशन सच के संपादक है।
    राजेश रवि , लेखक मिशन सच के संपादक है।

    भारत की सबसे प्राचीन पर्वतमाला अरावली एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्णय के बाद देशभर में यह बहस तेज हो गई है कि क्या अरावली पर वास्तव में कोई नया संकट मंडरा रहा है या फिर यह केवल एक राजनीतिक भ्रम है। इसी बीच ‘सेव अरावली’ जैसे अभियान सामने आए हैं, तो दूसरी ओर केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने इन आशंकाओं को निराधार बताते हुए इसे कांग्रेस की साजिश करार दिया है। 

    सुप्रीम कोर्ट का निर्णय: क्या कहा गया?

    सुप्रीम कोर्ट ने अपने हालिया आदेश में अरावली पर्वतमाला की परिभाषा और उसके संरक्षण को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणियां की हैं।  अदालत ने कुछ मामलों में अरावली को ऊँचाई आधारित मानदंडों से जोड़ने की बात भी कही, जिससे यह आशंका उत्पन्न हुई कि 100 मीटर से कम ऊँचाई वाले क्षेत्रों को संरक्षण से बाहर किया जा सकता है। यहीं से विवाद की शुरुआत होती है। पर्यावरण विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों का मानना है कि अरावली को केवल ऊँचाई के आधार पर परिभाषित करना वैज्ञानिक और पर्यावरणीय दृष्टि से उचित नहीं है, क्योंकि इसकी निचली पहाड़ियाँ भी जल संरक्षण, भूजल रिचार्ज और जैव विविधता में उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।  अदालत ने यह भी   स्पष्ट किया कि अरावली को संरक्षित करने के लिए एक समग्र और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए तथा केंद्र सरकार को इसके लिए एकीकृत प्रबंधन योजना (मास्टर प्लान) तैयार करनी होगी।

    ‘सेव अरावली’ अभियान की चिंता

    ‘सेव अरावली’ अभियान से जुड़े लोगों का तर्क है कि यह फैसला अप्रत्यक्ष रूप से अरावली के बड़े हिस्से को खनन, रियल एस्टेट और औद्योगिक गतिविधियों के लिए खोल सकता है। उनका कहना है कि यदि निचले क्षेत्रों को संरक्षण से बाहर कर दिया गया, तो इसका लाभ वे ताकतवर लॉबी उठाएंगी, जो पहले भी अरावली को नुकसान पहुँचा चुकी हैं।

    आंदोलनकारियों का डर इतिहास से जुड़ा है। 1990 के दशक में भी सीमित छूट के नाम पर बड़े पैमाने पर खनन हुआ था, जिसके परिणामस्वरूप कई क्षेत्रों में भूजल स्तर गिरा, जंगल उजड़े और पर्यावरणीय असंतुलन बढ़ा। इसी अनुभव के चलते वे आशंकित हैं कि यह निर्णय अरावली को फिर उसी रास्ते पर ले जा सकता है। इस अभियान के साथ सामाजिक संगठनों के अलावा कांग्रेस भी साथ खड़ी है। राजस्थान में विपक्ष के नेता टीकाराम जूली जयपुर व अन्य जिलों में इस संबंध में सरकार के खिलाफ प्रेस कॉन्फ्रेंस कर चुके है। 

    सरकार और पर्यावरण मंत्री का पक्ष

    केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने इन तमाम आशंकाओं को सिरे से खारिज किया है। उनका कहना है कि अरावली को लेकर कोई खतरा नहीं है और सरकार इसके संरक्षण के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। उन्होंने ‘सेव अरावली’ अभियान को राजनीतिक रंग देते हुए इसे कांग्रेस द्वारा फैलाया गया भ्रम बताया है।

    सरकार का तर्क है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार बनाई जाने वाली नीति वैज्ञानिक, संतुलित और विकास के साथ पर्यावरण संरक्षण को साधने वाली होगी। मंत्री के अनुसार, अदालत ने खनन को खुली छूट नहीं दी है, बल्कि स्पष्ट रूप से नियमन और प्रबंधन की बात कही है।

    तो असलियत क्या है?

    सच्चाई इन दोनों ध्रुवों के बीच कहीं स्थित है।
    एक ओर यह कहना गलत होगा कि सुप्रीम कोर्ट ने अरावली को नष्ट करने का रास्ता खोल दिया है। अदालत ने संरक्षण की आवश्यकता पर ही बल दिया है। दूसरी ओर यह भी उतना ही सच है कि भारत में नीतियों का क्रियान्वयन अक्सर सबसे बड़ी चुनौती रहा है। यदि परिभाषा में थोड़ी-सी ढील दी जाती है, तो उसका दुरुपयोग होने की आशंका को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता।

    असल चिंता नीति से कम और उसके लागू होने के तरीके से अधिक जुड़ी है। यदि नीति निर्माण में पर्यावरणविदों, स्थानीय समुदायों और स्वतंत्र वैज्ञानिकों को शामिल नहीं किया गया, तो अच्छे इरादों के बावजूद परिणाम नकारात्मक हो सकते हैं।

    राजनीति बनाम पर्यावरण

    इस पूरे विवाद में राजनीति की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। पर्यावरण जैसे गंभीर विषय पर भी आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलना दुर्भाग्यपूर्ण है। किसी भी जनआंदोलन को केवल “राजनीतिक साजिश” कहना उतना ही खतरनाक है, जितना हर सरकारी कदम को “पर्यावरण विरोधी” ठहराना।

    वास्तविक सवाल यह होना चाहिए कि क्या आने वाली नीति अरावली को एक जीवित पारिस्थितिकी तंत्र मानेगी या केवल कागज़ी रेखाओं में बाँट देगी?

    अरावली पर संकट की बात पूरी तरह काल्पनिक नहीं है, लेकिन अभी हालात अपरिवर्तनीय भी नहीं हैं। यह समय चेतावनी का है, टकराव का नहीं। सरकार, समाज और पर्यावरण समूह—तीनों को मिलकर ऐसी नीति बनानी होगी, जिसमें विकास और संरक्षण के बीच संतुलन हो। यदि आज सजगता दिखाई गई, तो अरावली को बचाया जा सकता है। लेकिन यदि इसे केवल राजनीतिक बहस तक सीमित कर दिया गया, तो आने वाली पीढ़ियों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। अरावली का भविष्य अब फैसलों से ज्यादा नीयत और निगरानी पर निर्भर करता है।

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