अलवर : संजय सचेती कोठी वालों का सफर
अलवर। जैन समाज में अनेक ऐसे व्यक्तित्व हैं जो अपनी मेहनत, संघर्षशीलता और सकारात्मक दृष्टिकोण के कारण समाज में विशिष्ट स्थान प्राप्त करते हैं। अलवर के प्रतिष्ठित व्यवसायी एवं समाजसेवी संजय सचेती “कोठी वाले” ऐसा ही एक नाम हैं, जिनकी जीवन यात्रा दृढ़ संकल्प, कठिन परिश्रम और निरंतर प्रगति का उत्कृष्ट उदाहरण है। इन्हें पिछले दिनों अलवर में मिशनसच की ओर से आयोजित एक समारोह में केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव व राजस्थान सरकार के मंत्री संजय शर्मा ने सम्मानित किया।
महज बारह वर्ष की आयु में अपने जीवन की जिम्मेदारियाँ संभालने वाले संजय जी ने विपरीत परिस्थितियों को कभी बाधा नहीं बनने दिया। धैर्य, लगन और सूझबूझ के बल पर उन्होंने न केवल अपने परिवार को संभाला बल्कि अलवर शहर में जैन समाज के प्रमुख व्यक्तित्वों में अपनी मजबूत पहचान भी स्थापित की।
संजय सचेती का जीवन प्रारंभ से ही सामान्य नहीं रहा। बचपन ने उन्हें बहुत जल्दी बड़ा बनना सिखा दिया। जब वे लगभग आठ वर्ष के थे, तभी उनके जीवन पर दुख का गहरा साया पड़ा—पिता विनय चंद सचेती का देहांत हो गया। घर में आर्थिक और भावनात्मक संकट दोनों उपस्थित थे। बड़े भाई कुशल सचेती की आयु भी उस समय परिवार की जिम्मेदारी संभालने योग्य नहीं थी। पिता की कमी, घर की जिम्मेदारियाँ और अनिश्चित भविष्य—इन सभी परिस्थितियों ने बचपन को अत्यंत चुनौतीपूर्ण बना दिया।
शुरुआत में बड़े भाई ने अलवर व जयपुर आदि में रोजगार का प्रयास किया, परंतु कम आयु और अनुभव की कमी के कारण प्रयास अधिक दूर तक नहीं चल पाया। कुछ समय तक घर पूरी तरह संघर्ष के दौर से गुजरा, परंतु कठिनाइयाँ ही बड़े अवसरों का मार्ग बनती हैं। यही वह समय था जब दोनों भाइयों ने मिलकर नई दिशा में कदम बढ़ाने का निर्णय लिया।
सन 1991 में कुशल और संजय सचेती ने मिलकर शेयर मार्केट में कदम रखा। उस समय अलवर में इस प्रकार का कार्य बहुत कम होता था। न बुनियादी सुविधाएँ थीं, न तकनीकी साधन और न ही कोई बड़ा मार्गदर्शन। मुंबई मार्केट से सीधे जुड़कर कार्य करना तो दूर की बात थी, लेकिन सचेती बंधुओं का नजरिया अलग था। उन्होंने स्वयं जोखिम उठाया, स्वयं सीखा और स्वयं ही अवसर बनाए।
अलवर शहर में मुंबई मार्केट से सीधे जुड़े शेयर ट्रेडिंग की शुरुआत करना एक अत्यंत साहसिक निर्णय था। दोनों भाइयों की मेहनत, त्वरित निर्णय क्षमता, गहन अध्ययन और व्यावसायिक समझ ने इस कार्य को गति दी। व्यापार आगे बढ़ता गया, अनुभव और पहचान भी बढ़ती गई। धीरे-धीरे यह क्षेत्र उनकी विशेषज्ञता बन गया और फिर उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
इसी दौरान संजय जी ने अपनी शिक्षा भी जारी रखी। निरंतर कार्य के बीच भी उन्होंने सीखने की प्रवृत्ति नहीं छोड़ी। अलवर शहर के हैप्पी स्कूल और राजर्षि कॉलेज से शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने सी.ए. (चार्टर्ड अकाउंटेंट) की पढ़ाई की। पढ़ाई और व्यापार दोनों को संतुलित करना आसान नहीं था, लेकिन लक्ष्य के प्रति उनकी निष्ठा ने इसे संभव बनाया।
संजय सचेती का प्रारंभिक निवास अलवर के प्रसिद्ध बजाजा बाजार में था। वर्षों तक वहीं से व्यापार और सामाजिक गतिविधियाँ संचालित होती रहीं। बाद में परिवार के विस्तार और बढ़ती जिम्मेदारियों को ध्यान में रखते हुए उन्होंने जयपुर रोड पर नया आवास बनाया, जहाँ वे पिछले लगभग चार वर्षों से अपने परिवार के साथ निवास कर रहे हैं।
उनके पिता स्व. विनय चंद सचेती अलवर के विशिष्ट व्यक्तित्वों में गिने जाते थे। उनका जीवन समाजसेवा, शिक्षा और संगठनात्मक कार्यों के प्रति गहरी प्रतिबद्धता का उदाहरण रहा। वे बाल भारती स्कूल के फाउंडर मेंबर थे। सामाजिक सेवा के क्षेत्र में उनका योगदान अप्रतिम रहा। लायंस क्लब अलवर शाखा की स्थापना का श्रेय भी उन्हें ही जाता है।
वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सक्रिय कार्यकर्ता रहे और समाज में समरसता, अनुशासन तथा राष्ट्रीय चेतना को सुदृढ़ करने हेतु निरंतर कार्य करते रहे।
माताजी — श्रीमती प्रेम कुमारी सचेती परिवार की परंपराओं और संस्कारों की आधारशिला हैं।
भाभीजी — श्रीमती प्रेम जैन परिवार का महत्वपूर्ण स्तंभ हैं।
पत्नी — श्रीमती इंदू सचेती गृहिणी होते हुए भी परिवार को संभालने में सशक्त सहयोग देती हैं।
पुत्र — नमित सचेती सी.ए. हैं और दिल्ली में फाइनेंस कंपनी का संचालन करते हैं। साथ ही एक्सपोर्ट कार्य में भी सक्रिय हैं।
बहू — तन्वी सचेती गृहिणी हैं।
पोती — काशवी परिवार की खुशियों का प्रतीक है।
मिनी सचेती का विवाह भीलवाड़ा निवासी संपत मल जी बाफना के सुपुत्र मनीष बाफना से हुआ है, जो मुंबई में निवास करते हैं और भीलवाड़ा में कपड़ों की फैक्ट्री का संचालन करते हैं।
पूजा सचेती का विवाह अलवर के प्रतिष्ठित उद्योगपति विरेंद्र अग्रवाल (अलवर मैन्युफैक्चरिंग) के पुत्र प्रांशु अग्रवाल से हुआ है।
बहन — संध्या बैराठी जयपुर में निवास करती हैं।
जैन समाज में संथारा (सल्लेखना) अत्यंत पवित्र और तपस्या से जुड़ा संस्कार माना जाता है। बड़े भाई कुशल सचेती ने वर्ष 2017 में पूर्ण आत्मिक शांति और संकल्प के साथ संथारा ग्रहण किया। समाज ने उनके इस निर्णय को अत्यंत सम्मान के साथ स्वीकार किया।
अपने दिवंगत पिता की स्मृति में संजय जी ने “विनय सचेती मेमोरियल ट्रस्ट” की स्थापना की, जिसके माध्यम से वे निरंतर समाजसेवा के कार्य कर रहे हैं। ट्रस्ट द्वारा समय-समय पर स्वास्थ्य शिविर, दवाइयों का वितरण, जरूरतमंदों की सहायता तथा शिक्षा से जुड़े कार्यक्रम संचालित किए जाते हैं।
संजय सचेती जैन औषधालय की प्रबंधन समिति में लंबे समय तक सक्रिय रहे। वे जैन श्रावक संघ में उपाध्यक्ष के रूप में भी कार्य कर रहे हैं। साथ ही ओसवाल जैन स्कूल की कार्यकारिणी समिति में सदस्य के रूप में शिक्षा क्षेत्र में योगदान दे रहे हैं। वे केवल जैन समाज तक सीमित नहीं हैं। माधव सेवा समिति के उपाध्यक्ष के रूप में विभिन्न सामाजिक, चिकित्सीय एवं धार्मिक आयोजनों में सक्रिय भूमिका निभाते हैं।
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