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    Homeराजस्थानअलवरअष्टांग योग का चतुर्थ अंग: प्राणायाम

    अष्टांग योग का चतुर्थ अंग: प्राणायाम

    विश्व योग दिवस – 21 जून 2025
    लेख श्रृंखला – 5
    (भारतीय चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद का अभिन्न अंग – योग)
    (करो योग, रहो निरोग)

    डॉ. पवन सिंह शेखावत
    वरिष्ठ आयुर्वेद चिकित्सा अधिकारी

    योग दर्शन के अनुसार अष्टांग योग के आठ अंगों में प्राणायाम चतुर्थ स्थान पर आता है। यम, नियम और आसन के बाद यह मन और शरीर को योग के उच्चतर चरणों—धारण, ध्यान और समाधि—के लिए तैयार करता है। प्राचीन ग्रंथों जैसे भगवद गीता, पतंजलि योगसूत्र, हठयोग प्रदीपिका और घेरंड संहिता में प्राणायाम का विशद वर्णन मिलता है।


    @ प्राणायाम क्या है?

    प्राणायाम का शाब्दिक अर्थ है—प्राण (जीवन ऊर्जा) का आयाम (विस्तार या नियंत्रण)। यह श्वास-प्रश्वास की क्रियाओं से संबंधित है और इसका उद्देश्य शरीर के भीतर ऊर्जा प्रवाह को संतुलित करना तथा मानसिक स्थिरता प्राप्त करना है।


    @ प्राणायाम का उद्देश्य

    • शरीर में ऊर्जा का संचार

    • मन और शरीर के बीच संतुलन स्थापित करना

    • लंबी और स्वस्थ जीवनशैली को प्रोत्साहित करना


    @ प्राणायाम के लाभ

    • मानसिक तनाव और चिंता में कमी

    • मन की चंचलता पर नियंत्रण

    • फेफड़ों की कार्यक्षमता में सुधार

    • ध्यान और एकाग्रता में वृद्धि

    • दीर्घायु और आंतरिक शांति प्राप्त करना

    ऋषि-मुनियों की दीर्घ तपस्या और आध्यात्मिक साधना में प्राणायाम का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रहा है।


    @ प्राणायाम की तीन मूल क्रियाएं

    1. पूरक – नासिका द्वारा श्वास को भीतर लेना

    2. कुम्भक – श्वास को भीतर रोककर रखना

    3. रेचक – श्वास को बाहर निकालना

    इन तीन क्रियाओं को हठयोग में क्रमशः अभ्यंतर वृत्ति, स्तम्भ वृत्ति और बाह्य वृत्ति कहा गया है।


    @ प्रमुख प्राणायाम के प्रकार

    1. भस्त्रिका प्राणायाम
    तेज गति से गहराई से सांस लेना और छोड़ना। श्वसन तंत्र को शक्ति प्रदान करता है।

    2. कपालभाति
    तेज़ गति से श्वास छोड़ना और पेट को भीतर खींचना। पेट और पाचन तंत्र के लिए लाभकारी।

    3. उज्जायी प्राणायाम
    गले से ‘ओसियन ब्रीथ’ जैसी ध्वनि के साथ श्वास लेना। मन को स्थिर करता है और सर्दी में उपयोगी है।

    4. शीतली प्राणायाम
    जीभ को मोड़कर सांस लेना, नाक से छोड़ना। शरीर को शीतलता प्रदान करता है।

    5. शीतकारी प्राणायाम
    दांतों के बीच से सीटी जैसी आवाज के साथ श्वास लेना, फिर नाक से छोड़ना। मन और तन को शांति देता है।

    6. चंद्र अनुलोम-विलोम
    एक नासिका से श्वास लेना, दूसरी से छोड़ना। शरीर में चंद्र ऊर्जा को सक्रिय करता है।

    7. नाड़ी शुद्धि प्राणायाम
    बारी-बारी से नासिका छिद्रों का प्रयोग कर श्वास लेना-छोड़ना। नाड़ियों की शुद्धि करता है।

    8. भ्रामरी प्राणायाम
    कानों को बंद कर ‘ओम्’ ध्वनि के साथ श्वास छोड़ना। मन को गहराई से शांत करता है।


    @ निष्कर्ष

    प्राणायाम श्वसन तंत्र को सुदृढ़ करता है, मानसिक स्थिति को सन्तुलित करता है और आत्मिक शांति प्रदान करता है। यदि इसे नियमित रूप से अपनाया जाए, तो यह न केवल हमें रोगमुक्त रखता है, बल्कि जीवन में अनुशासन, ऊर्जा और आनंद भी भरता है।

    “प्राणायाम को जीवन का हिस्सा बनाएं – स्वस्थ तन, प्रसन्न मन और शांत आत्मा पाएं।”


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