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    अष्टान्हिका पर्व से भक्तिमय हुआ अलवर, मुनि सौम्य सागर महाराज ने किया केशलोंच

    पर्व के दौरान संयम और साधना का संदेश, प्रवचन में बोले— मित्र बनाने पड़ते हैं, शत्रु स्वयं बन जाते हैं

    अलवर। जैन धर्मावलम्बियों का पावन अष्टान्हिका पर्व मंगलवार से श्रद्धा एवं धार्मिक उल्लास के साथ शुरू हो गया। इस वर्ष अष्टान्हिका पर्व नौ दिवसीय मनाया जा रहा है। पर्व के शुभारंभ के साथ ही जैन मंदिरों में पूजा-अर्चना, उपवास और धार्मिक अनुष्ठानों का सिलसिला शुरू हो गया है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु संयम, तप और आराधना के मार्ग पर अग्रसर हैं।

    जैन पत्रकार महासंघ, अलवर के जिला संयोजक हरीश जैन ने बताया कि अष्टान्हिका पर्व जैन धर्म का अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है। वर्ष में फाल्गुन, आषाढ़ और कार्तिक माह में यह पर्व तीन बार मनाया जाता है। पर्व के दौरान श्रद्धालु उपवास, पूजा-अर्चना और धार्मिक साधना के माध्यम से आत्मशुद्धि का प्रयास करते हैं।

    उन्होंने बताया कि स्कीम नंबर-10 स्थित जैन भवन में इन दिनों दिगम्बर जैन संत मुनि सौम्य सागर महाराज ससंघ विराजमान हैं। उनके सान्निध्य में अष्टान्हिका पर्व के विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं, जिनमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु भाग ले रहे हैं।

    मुनि सौम्य सागर महाराज ने किया केशलोंच

    श्री दिगम्बर जैन अग्रवाल पंचायती मंदिर के मंत्री कैलाश चंद जैन ने बताया कि मंगलवार को मुनि सौम्य सागर महाराज ने केशलोंच किया। जैन परंपरा में मुनियों द्वारा अपने बालों को स्वयं हाथों से उखाड़ने की इस तपस्या को केशलोंच कहा जाता है, जिसे वैराग्य, संयम और आत्मसंयम का प्रतीक माना जाता है।

    ‘राग-द्वेष ही मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु’

    मंगल प्रवचन में मुनि सौम्य सागर महाराज ने कहा कि “जीवन में मित्र बनाने पड़ते हैं, लेकिन शत्रु स्वतः बन जाते हैं।” उन्होंने कहा कि मनुष्य के वास्तविक शत्रु राग, द्वेष, कषाय, लोभ, हिंसा और परिग्रह हैं। यदि व्यक्ति स्वयं को पहचान ले, तो उसका जीवन सार्थक और कल्याणकारी बन सकता है।

    उन्होंने कहा कि जीवन में प्राप्त लाभ का सदुपयोग करना चाहिए। यदि व्यक्ति लोभ में पड़ जाता है, तो उसका वास्तविक कल्याण संभव नहीं है।

    अपने प्रवचन में उन्होंने गेहूं का उदाहरण देते हुए कहा कि यदि गेहूं को मुट्ठी में बंद रखा जाए तो वह सड़ जाएगा, लेकिन यदि उसे भूमि में बोया जाए तो वह अनेक गुना होकर फसल के रूप में लौटता है। उसी प्रकार यदि किसी का भला करें तो बदले में मान-सम्मान की अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए। सच्चा सम्मान वही है, जो व्यक्ति के श्रेष्ठ आचरण और सेवा से स्वतः प्राप्त हो।

    अष्टान्हिका पर्व के अवसर पर जैन मंदिरों में आगामी दिनों में भी विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान, पूजन, प्रवचन और आराधना कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।

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