राष्ट्रीय अध्यक्ष हों या उपप्रधानमंत्री, आडवाणी के लिए पहले मित्र थे सूर्य कुमार गुप्ता; पद और प्रोटोकॉल से परे जीवनभर निभाई दोस्ती
राजेश रवि | अलवर
कुछ रिश्ते पद, प्रतिष्ठा और राजनीतिक हैसियत से नहीं, बल्कि आत्मीयता, विश्वास और जीवनभर निभाई गई दोस्ती से पहचाने जाते हैं। शिक्षाविद् सूर्य कुमार गुप्ता की जिंदगी ऐसी ही दोस्ती और सिद्धांतों की मिसाल रही। पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी से उनकी मित्रता इतनी गहरी थी कि बड़े से बड़ा पद भी दोनों के बीच की सहजता और अपनत्व को कम नहीं कर सका। आडवाणी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे हों या देश के उपप्रधानमंत्री, गुप्ता के लिए वे पहले मित्र थे। आडवाणी के लिए भी गुप्ता ऐसे आत्मीय साथी थे, जिन्हें भीड़ में तलाशकर बुलाया जा सकता था और जिनके परिवार के साथ बैठकर घर के समोसे-कचौरी और अचार का स्वाद लिया जा सकता था।
8 अक्टूबर 2026 की रात करीब सवा दस बजे 91 वर्ष की उम्र में सूर्य कुमार गुप्ता का निधन हो गया। उनके जाने से अलवर की सामाजिक और शैक्षिक दुनिया ने ऐसे व्यक्ति को खो दिया, जिसने जीवनभर अपने संबंधों को निजी लाभ का जरिया नहीं बनने दिया।
आठ साल की उम्र में संघ से जुड़ाव, आडवाणी से यूं बना रिश्ता
गुप्ता का जन्म 15 जनवरी 1935 को अलवर जिले के राजगढ़ में हुआ। मूल गांव तिलवाड़ है। करीब आठ वर्ष की उम्र में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ गए। संघ के प्रचारकों के सान्निध्य में उनका सामाजिक और वैचारिक दायरा बढ़ा। इसी दौरान अलवर में प्रचारक बनकर आए लालकृष्ण आडवाणी से उनका परिचय हुआ, जो धीरे-धीरे ऐसी मित्रता में बदल गया, जो दशकों कायम रही। यह दोस्ती दो व्यक्तियों तक सीमित नहीं रही। आडवाणी की पत्नी कमला और गुप्ता की पत्नी मीरा, जो अलवर के शिक्षाविद् कन्हैयालाल गुप्ता की पुत्री थीं, के बीच भी आत्मीय रिश्ता बन गया। दोनों परिवार एक-दूसरे के सुख-दुःख में शामिल होने लगे।
15 मिनट प्लेटफॉर्म पर रुकी रही पिंकसिटी एक्सप्रेस
आडवाणी जब भी दिल्ली से ट्रेन में जयपुर आते, गुप्ता को संदेश भिजवा देते कि मित्रों को लेकर स्टेशन आ जाएं। एक बार वे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में पिंकसिटी एक्सप्रेस से आ रहे थे। सूचना मिलते ही गुप्ता मित्रों के साथ स्टेशन पहुंच गए। ट्रेन रुकी, आडवाणी नीचे उतरे और गुप्ता ने साथियों का परिचय कराया। फिर बातचीत ऐसी चली कि समय का ध्यान ही नहीं रहा। ट्रेन 15 मिनट से अधिक प्लेटफॉर्म पर खड़ी रही। उधर, आडवाणी को देखने के लिए प्लेटफॉर्म पर भीड़ जमा होने लगी। उस मुलाकात में राष्ट्रीय अध्यक्ष का औपचारिक व्यक्तित्व पीछे था और मित्रों के बीच सहज बातचीत आगे।
सभा खत्म, कार में बैठ चुके थे आडवाणी; तभी मंच से आया बुलावा
दूसरा प्रसंग अलवर के पुरजन विहार कंपनी बाग का है। आडवाणी उपप्रधानमंत्री के रूप में चुनावी सभा को संबोधित करने आए थे। सभा खत्म हो चुकी थी और भारी सुरक्षा के बीच वे कार में बैठ चुके थे, सर्किट हाउस के लिए रवाना होने ही वाले थे। तभी मंच संचालन कर रहे सोहनलाल सुलानिया फिर मंच पर पहुंचे और घोषणा की कि सूर्य कुमार जी भाई साहब यहां आए हों तो तुरंत मंच के पीछे पहुंचें, लालजी उन्हें याद कर रहे हैं। इस बार आडवाणी के आने की खबर गुप्ता को नहीं मिली थी, इसलिए वे सभा में आम लोगों के बीच पीछे बैठे थे। संदेश मिला तो पुलिस सुरक्षा में उन्हें आडवाणी के पास ले जाया गया। आडवाणी ने उन्हें अपनी कार में बैठाया और साथ सर्किट हाउस ले गए, जहां दोनों की लंबी बातचीत हुई। पद, सुरक्षा और औपचारिकताओं के घेरे में भी मित्र के लिए खास जगह बची हुई थी। भीड़ में बैठे होने के बावजूद आडवाणी उन्हें भूले नहीं थे।
सिलीसेढ़ में नेताओं की कतार, पर पहले बुलाया गुप्ता के परिवार को
सबसे दिलचस्प प्रसंग सिलीसेढ़ झील के पैलेस का है। आडवाणी निजी यात्रा पर परिवार सहित अलवर आए और सिलीसेढ़ में ठहरे। पहले दिन गुप्ता को खबर नहीं थी। शाम को तत्कालीन जिला कलेक्टर विनोद जुत्शी का फोन आया कि आडवाणी जी मिलना चाहते हैं और अगले दिन पूरे परिवार के साथ नाश्ते पर बुलाया है। गुप्ता अगले दिन पत्नी मीरा, पांचों पुत्रों, दो पुत्रवधुओं और दोनों पौत्रों के साथ पहुंचे। वे खाली हाथ नहीं गए। अलवर के समोसे-कचौरी, आलू की सब्जी, जलेबी और घर के बने कई तरह के अचार साथ पैक करा लिए। परिवार ने समझाया कि उपप्रधानमंत्री रह चुके व्यक्ति के यहां खाने का पूरा इंतजाम होगा, इतना ले जाने की जरूरत नहीं। पर गुप्ता किसी औपचारिक भेंट पर नहीं, पुराने मित्र से मिलने जा रहे थे। वे घर का स्वाद और अपनत्व लेकर पहुंचे।
वहां पूर्व मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत समेत कई मंत्री, पूर्व मंत्री, विधायक और सांसद आडवाणी से मिलने की प्रतीक्षा में थे। इसके बावजूद पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी गुप्ता के परिवार को एस्कॉर्ट करते हुए सीधे आडवाणी के पास ले गए। साथ में स्थानीय मित्र मिलावाराम गांधी के पुत्र, फोटोग्राफर जुगल गांधी भी थे। आडवाणी ने परिवार के साथ अलग-अलग कोणों से खूब तस्वीरें खिंचवाईं। फिर नाश्ते का समय आया। आडवाणी ने बैठते ही समोसे-कचौरी और जलेबी मंगवा ली। परिवार के सदस्य एक-दूसरे का मुंह देखने लगे। जिस खाने को ले जाने से वे गुप्ता को रोक रहे थे, आडवाणी ने सबसे पहले उसी की फरमाइश कर दी। तभी कमला आडवाणी ने मीरा गुप्ता से पूछा, “लालजी तुम्हारे अचार की तारीफ करते रहते हैं, आज लाई नहीं क्या?” मीरा जी ने तुरंत अचार निकालकर पेश कर दिए। इस छोटे-से प्रसंग में दोनों परिवारों के रिश्ते की पूरी कहानी समाई थी। पद और प्रोटोकॉल पीछे छूट गए थे और घर के समोसे-कचौरी और अचार दोस्ती की पहचान बन गए थे।
ललित किशोर चतुर्वेदी से भी गहरी मित्रता, पर कभी नहीं उठाया फायदा
गुप्ता की मित्रता आडवाणी तक सीमित नहीं थी। राजगढ़ में स्कूली शिक्षा के बाद उन्होंने अलवर के आरआर कॉलेज में पढ़ाई की। राजकीय सेवा की शुरुआत कोटा से हुई, जहां ललित किशोर चतुर्वेदी से उनकी गहरी दोस्ती हुई। चतुर्वेदी आगे चलकर भाजपा के प्रमुख नेताओं में शामिल हुए।आडवाणी और चतुर्वेदी जैसे नेताओं से निकटता के बावजूद गुप्ता ने इन संबंधों का उपयोग कभी राजनीतिक या व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं किया। कई लोगों ने सलाह दी, पर उन्होंने हर बार इनकार किया। उनके लिए दोस्ती का अर्थ मित्रता निभाना था, उससे काम निकलवाना नहीं। वे संबंधों की अहमियत जानते थे, पर उनकी कीमत नहीं लगाते थे। इसीलिए अलवर में उनकी मित्रता आज भी सम्मान से याद की जाती है।
राम मंदिर आंदोलन में परिवार की भागीदारी
सामाजिक और वैचारिक सक्रियता उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा रही। अयोध्या में कारसेवा का आह्वान हुआ तो गुप्ता और उनका परिवार आगे रहा। वे, पत्नी मीरा और पुत्र महितोष खंडेलवाल अलग-अलग समय पर अयोध्या पहुंचे। महितोष उस समय गए, जब उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की सरकार थी और कारसेवकों पर गोली चली। जोधपुर के महेंद्रनाथ अरोड़ा को गोली लगी। महितोष उनके साथ थे और बाद में अरोड़ा के पत्र तथा कपड़े लेकर अलवर पहुंचे। यह प्रसंग परिवार की प्रतिबद्धता और उस दौर के घटनाक्रम से उसके सीधे जुड़ाव को दर्शाता है। गुप्ता जीवनभर संघ से जुड़े रहे। उम्र बढ़ने पर भी दिनचर्या में अनुशासन बना रहा। अंतिम समय तक सूर्य नमस्कार, योग-व्यायाम और नियमित सैर जारी रही।
पिता से मिली विरासत
सामाजिक सक्रियता की जड़ें परिवार में थीं। पिता जमनालाल गुप्ता महात्मा गांधी के आंदोलनों से जुड़े थे और क्रांतिकारियों की मदद करते थे। कोई क्रांतिकारी राजगढ़ या आसपास आता तो वे उसके छिपने का इंतजाम करते, अपना निजी ग्रामोफोन लेकर पहुंचते और जोशीले गीत सुनाकर उसका मनोबल बढ़ाते थे। पिता से मिली यही जिम्मेदारी और लोगों से जुड़ने की प्रवृत्ति सूर्य कुमार गुप्ता के जीवन में भी दिखी।
पद नहीं, रिश्तों की मिठास छोड़ गए गुप्ता
8 अक्टूबर की रात उनका जीवन सफर थम गया। 9 अक्टूबर को अंतिम संस्कार हुआ। पर उनके जीवन के प्रसंग आज भी बताते हैं कि बड़ी पहचान केवल पद और प्रतिष्ठा से नहीं बनती। कभी प्लेटफॉर्म पर रुकी ट्रेन, कभी सुरक्षा घेरे से आया बुलावा, कभी सिलीसेढ़ में घर के समोसे-कचौरी और अचार के साथ हुई मुलाकात, ये सब उस विरासत के हिस्से हैं, जिसमें दोस्ती को स्वार्थ से ऊपर रखा गया। समय और पद बदलते रहे, पर रिश्ते की सहजता नहीं बदली। सूर्य कुमार गुप्ता अपने पीछे केवल स्मृतियां नहीं, यह संदेश भी छोड़ गए कि सच्ची मित्रता में हैसियत नहीं, अपनत्व मायने रखता है, और संबंधों से फायदा उठाना नहीं, उन्हें जीवनभर निभाना मायने रखता है।

