प्रवचन में उपवास का बताया महत्व, भजन-पूजन उत्साह से करने और फास्ट फूड से बचने का दिया संदेश
अलवर। जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा में मुनिश्री सौम्य सागर जी महाराज ने प्रवचनों के दौरान उपवास, संयम, स्वाध्याय एवं सात्विक जीवनशैली का महत्व बताते हुए कहा कि भोजन शरीर के लिए आवश्यक है, लेकिन संयमित भोजन और समय-समय पर उपवास करना शरीर एवं आत्मा दोनों के लिए लाभकारी है।
मुनिश्री ने कहा कि पांचों इंद्रियां शरीर का ही भाग हैं और उनका संबंध भी भोजन एवं विषयों से है। शरीर का संचालन भोजन से होता है, लेकिन आवश्यकता से अधिक भोजन शरीर के लिए हानिकारक बन जाता है। इसलिए शरीर को स्वस्थ रखने के लिए समय-समय पर उपवास करना आवश्यक है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार चक्की के दोनों पाट लगातार चलने के बाद विश्राम चाहते हैं, उसी प्रकार मनुष्य की इंद्रियों को भी निरंतर कार्य करने के बाद आराम की आवश्यकता होती है। उपवास इंद्रियों को विश्राम देने का सर्वोत्तम माध्यम है।
मुनिश्री ने कहा कि भजन, पूजन और स्वाध्याय सदैव उत्साह एवं उमंग के साथ करना चाहिए। यदि स्वाध्याय के प्रति श्रद्धा और सम्मान नहीं होगा तो व्यक्ति के ज्ञान का ह्रास होने लगता है। धर्म के प्रति समर्पण ही आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है।
उपवास के महत्व पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि संयमित जीवनशैली और उपवास से अनेक प्रकार की बीमारियों से बचाव संभव है। उन्होंने बताया कि विभिन्न शोधों में भी उपवास के लाभ सामने आए हैं। साथ ही उन्होंने भारतीय पारंपरिक भोजन की महत्ता बताते हुए कहा कि दाल, भात और रोटी जैसे सात्विक भोजन पीढ़ियों के स्वास्थ्य की रक्षा करते हैं, जबकि फास्ट फूड आने वाली पीढ़ियों को अनेक रोगों की ओर धकेल रहा है।
मुनिश्री ने कहा कि हर रोग की शुरुआत मन से होती है और उसका प्रभाव शरीर पर दिखाई देता है। इसलिए संतों के प्रवचनों का उद्देश्य केवल धार्मिक उपदेश देना नहीं, बल्कि मनुष्य की दुष्प्रवृत्तियों को दूर कर उसे संयम, सदाचार और स्वस्थ जीवन की ओर प्रेरित करना भी है।
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