अलवर। ग्रामीण अंचल में अब वे दिन लद गए जब घरों में सास व बहू के बीच टकराहट की आहट सुनाई पड़ती थी। इतना ही नहीं अब गांवों में महिलाएं परिवार नियोजन के प्रति भी जागरूक हुई हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के व्यवहार में बदलाव की यह बहार शिक्षा का स्तर बढ़ने के साथ ही विकल्प परियोजना के सरकार के साथ मिलकर किए जा रहे प्रयास के चलते दिखाई पड़ने लगी है। पूर्व में गांवों में साक्षरता की कमी के चलते लोग परिवार नियोजन के प्रति ज्यादा जागरुक नहीं थे, लेकिन अब ग्रामीण अंचलों में हालात काफी बदले हैं।
ग्रामीण अंचलों में जागरुकता की कमी के चलते विकल्प परियोजना राज्य सरकार के साथ मिलकर परिवार नियोजन के प्रति लोगों को जागरूक करने का कार्य कर रही है। इसी के अंतर्गत जिले के लक्ष्मणगढ़ ब्लॉक में मंगलवार को सास बहु सम्मेलन थीम पर कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम का उददेश्य ग्रामीण आंचल में सास बहुओं में परिवार नियोजन के लिए समझदारी बढ़ाना है। यह सम्मेलन सरकार द्वारा स्थापित एक सामुदायिक मंच है, विकल्प परियोजना राजस्थान के करीब 30 जिलों में इसके संचालन में सरकार का सहयोग कर रही है।
सास बहू सम्मेलन एक सामाजिक पहल
विकल्प परियोजना के राज्य परियोजना निदेशक अरुण नायर ने बताया कि मंगलवार को अलवर में आयोजित सास-बहू सम्मलेन परिवार नियोजन के क्षेत्र में एक प्रभावी सामाजिक पहल है। विकल्प परियोजना लगातार 2 वर्ष से इस तरह की पहल कर रही है। उन्होंने कहा कि पारंपरिक समाज में प्रजनन संबंधी निर्णयों में सास की भूमिका अहम मानी जाती है। ऐसे में बहू और सास के बीच संवाद स्थापित कर उन्हें वैज्ञानिक, सुरक्षित और स्वैच्छिक परिवार नियोजन विकल्पों की जानकारी देना बेहद जरूरी है। उन्होंने बताया कि सास का समर्थन मिलने पर युवतियां अपने स्वस्थ व सुखद पारिवारिक जीवन के फैसले लेने में सशक्त बनती हैं। इस तरह दोनों पीढ़ियों में परिवार नियोजन की समझ और जागरुकता बढ़ाकर मातृ-शिशु स्वास्थ्य को बेहतर किया जा सकता है, इससे पूरे परिवार की खुशहाली सुनिश्चित की जा सकती है। इसके लिए विकल्प परियोजना सरकार के साथ मिलकर कार्य कर रही है।
आशा सहयोगिनी भी कर रही जागरूक
लक्ष्मणगढ़ ब्लॉक के बीसीएमओ डॉ. रूपेंद्र शर्मा ने बताया कि मंगलवार को विकल्प परियोजना की ओर से ग्रामीण अंचल में सास बहू सम्मेलन के जरिए सास बहू संवाद से परिवार नियोजन के प्रति महिलाओं को जागरूक किया गया। उन्होंने कहा कि आजकल देखा गया है कि ग्रामीण अंचल में लड़कियों की शादी 18 से 20 वर्ष की उम्र में कर दी जाती है। इसके कुछ समय बाद ही वह गर्भ धारण कर लेती हैं, जबकि इस दौरान वह इस स्थिति के लिए मानसिक व शारीरिक रूप से तैयार नहीं होती। विकल्प परियोजना की ओर से सास व बहू को जागरूक किया गया कि फैमिली प्लानिंग जरूरी है। इसके लिए सरकार विकल्प परियोजना के माध्यम से महिलाओं को जागरूक कर रही है कि शादी के बाद पहला बच्चा करीब दो साल बाद होना चाहिए। इसके लिए ग्रामीण अंचल में आशा सहयोगिनी भी महिलाओं को जागरूक कर रही है। डॉ. शर्मा ने कहा कि यह न सिर्फ महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए बेहद आवश्यक है बल्कि बच्चे के विकास के लिए भी जरूरी है। धरातल पर इसका असर भी दिखाई दे रहा है, महिलाओं में इसका सरकारात्मक परिणाम देखने को मिल रहे है। ग्रामीण आंचल में अब लोग स्वास्थ के प्रति जागरूक हो रहे हैं।


