लोकसभा में दी स्कूल बंद होने की जानकारी
राजेश रवि , अलवर। देश में शिक्षा को लेकर बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी तस्वीर कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। लोकसभा में दिए गए एक आधिकारिक जवाब के आधार पर सामने आया है कि पिछले करीब एक दशक में देशभर में 90 हजार से अधिक सरकारी स्कूल या तो बंद हुए हैं या मर्ज (विलय) कर दिए गए हैं।
केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय द्वारा पिछले दिनों संसद में दिए गए जवाब के अनुसार, यह आंकड़े UDISE+ (Unified District Information System for Education) पर आधारित हैं। वर्ष 2014-15 से लेकर हाल के वर्षों तक सरकारी स्कूलों की कुल संख्या में करीब 90 से 93 हजार की कमी दर्ज की गई है।
हालांकि सरकार ने स्पष्ट किया है कि “स्कूल बंद” होने का कोई केंद्रीकृत आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, क्योंकि स्कूल खोलना और बंद करना राज्यों का विषय है। सरकार के अनुसार, बड़ी संख्या में स्कूलों को पूरी तरह बंद नहीं किया गया, बल्कि उन्हें कम छात्र संख्या के कारण मर्ज या पुनर्गठित किया गया है।
सरकार का दावा है कि इस प्रक्रिया से शिक्षा व्यवस्था में सुधार हुआ है। संसाधनों का बेहतर उपयोग, शिक्षकों की उपलब्धता और बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करने के उद्देश्य से यह कदम उठाए गए हैं। साथ ही यह भी कहा गया है कि ड्रॉपआउट दर में कमी आई है और शिक्षा तक पहुंच पहले से बेहतर हुई है।
राजस्थान की स्थिति भी गंभीर
राजस्थान में भी सरकारी स्कूलों की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार:
- कुल रिक्त पद: 1.22 लाख
- जर्जर भवन: 3500
- जीर्ण कक्ष: 85,000
- बिना शौचालय वाले स्कूल: 13,500
ये आंकड़े बताते हैं कि राज्य में शिक्षा का बुनियादी ढांचा अभी भी कई चुनौतियों से जूझ रहा है।
विशेषज्ञों ने उठाए सवाल
एजुकेशन एक्सपर्ट प्रदीप पंचोली का कहना है कि स्कूलों के मर्ज होने का असर खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में देखने को मिल रहा है। उनके अनुसार, जहां पहले गांव में स्कूल उपलब्ध था, वहां अब बच्चों को दूर जाना पड़ रहा है, जिससे कई परिवारों के लिए शिक्षा तक पहुंच मुश्किल हो गई है।
उन्होंने सवाल उठाया कि:
- कितने बच्चे स्कूल दूर होने के कारण पढ़ाई छोड़ने को मजबूर हुए?
- क्या सभी परिवार अपने बच्चों को दूर स्थित स्कूल भेजने में सक्षम हैं?
नीतियों पर उठ रहे बड़े सवाल
- अगर स्कूलों की संख्या घटती रही तो शिक्षा का अधिकार कैसे सुनिश्चित होगा?
- क्या ग्रामीण और गरीब वर्ग के बच्चों पर इसका सबसे ज्यादा असर नहीं पड़ेगा?
- क्या शिक्षा व्यवस्था धीरे-धीरे केंद्रीकरण और दूरस्थ मॉडल की ओर बढ़ रही है?
सरकारी स्कूलों की संख्या में आई कमी को केवल “बंद” कहकर समझना पूरी तस्वीर नहीं है। इसमें स्कूलों का विलय, पुनर्गठन और कम नामांकन जैसी वजहें शामिल हैं। बावजूद इसके, यह स्पष्ट है कि इस बदलाव ने देशभर में शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक नई बहस खड़ी कर दी है—जिसके दूरगामी असर आने वाले समय में देखने को मिल सकते हैं।
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