महिलाओं के नाम पर दावे, जमीन पर हकीकत कड़वी: विधवा महिला दो महीने से टूटा मकान लेकर भटक रही, सरकार की योजनाओं पर उठे सवाल
मिशनसच न्यूज, अलवर।
राजस्थान सरकार जहां महिलाओं के सशक्तिकरण, सम्मान और सुरक्षा को लेकर बड़े-बड़े दावे कर रही है, वहीं जमीनी हकीकत कई बार इन दावों की पोल खोलती नज़र आती है। अलवर में एक बेबस विधवा महिला पिछले दो महीनों से अपने टूटे हुए मकान के लिए विभागीय दफ्तरों के चक्कर काट रही है, लेकिन उसकी सुनवाई अब तक नहीं हो सकी। यह मामला सरकार की योजनाओं की वास्तविक स्थिति पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़े करता है।
पीड़ित महिला कौशल शुक्रवार को अपनी पांच बेटियों और रिश्तेदारों के साथ नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली के कार्यालय पहुंची। हालांकि जूली स्वयं मौजूद नहीं थे, परंतु उनके सहयोगियों ने महिला की समस्या सुनी और उचित कार्रवाई का आश्वासन दिया।
दो महीने से किस्त अटकी, महिला दर-दर की ठोकरें खा रही
कौशल ने बताया कि उसका मकान पूरी तरह से जर्जर होकर ढह गया है। परिवार के पास रहने के लिए सुरक्षित स्थान तक नहीं बचा। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत उसे पहली किस्त जारी हो चुकी है, लेकिन दूसरी और तीसरी किस्त अब तक नहीं मिली।
विभाग के अधिकारियों से बार-बार गुहार लगाने के बावजूद उन्हें सिर्फ इतना जवाब मिलता है—
“जल्दी किस्त जारी हो जाएगी।”
लेकिन दो महीने बीत जाने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई। इस बीच महिला अपनी पांच बेटियों सहित खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर है।
परिवार आर्थिक रूप से कमजोर, निर्माण शुरू करना भी मुश्किल
कौशल के अनुसार उसकी आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर है कि सरकारी मदद के बिना वह घर का निर्माण कार्य शुरू भी नहीं कर सकती। घर ढह जाने के बाद से परिवार के सामने भोजन, पानी और सुरक्षा तक की समस्या खड़ी हो गई है। रात के समय खुले में रहने से बच्चियों की सुरक्षा पर भी खतरा मंडरा रहा है।
स्थानीय लोग भी बोले—“यही है सरकारी योजनाओं का भ्रष्ट क्रियान्वयन”
मौके पर मौजूद ग्रामीणों ने कहा कि
“सरकार भले ही महिलाओं और गरीबों के लिए योजनाएं लाती हो, लेकिन जमीनी स्तर पर अधिकारी लापरवाही बरतते हैं। यह मामला इसका ताजा उदाहरण है।”
स्थानीय लोगों का कहना है कि दो महीने से एक विधवा महिला की मदद न होना प्रशासनिक संवेदनहीनता को दर्शाता है।
बड़ा सवाल: क्या सरकार सुनेगी एक विधवा और उसकी पांच बेटियों की पुकार?
यह मामला सिर्फ एक परिवार की परेशानी नहीं, बल्कि सरकारी योजनाओं के धरातलीय क्रियान्वयन की सच्चाई भी उजागर करता है। जब एक विधवा महिला—जो वास्तव में योजना की पात्र श्रेणी में आती है—दो महीने से भटक रही है, तो यह दर्शाता है कि सिस्टम में गंभीर खामियां हैं।
क्या सरकार और प्रशासन इस पीड़ा को समझेंगे?
या फिर यह मामला भी फाइलों के बोझ में दबा रह जाएगा?
यह सवाल अब आमजन पूछ रहा है।
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