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    मोरपंख को लेकर उठे सवाल, मेनका गांधी को लिखा खुला पत्र

    हालिया मोरपंख विवाद के बीच वैज्ञानिक तथ्यों से रखा गया पक्ष

    अलवर। जैन साधु-संतों द्वारा उपयोग की जाने वाली मोरपंख की पीछी को लेकर हाल ही में दिए गए वक्तव्य के बाद शुरू हुए विवाद के बीच एक वन्यजीव संरक्षण कार्यकर्ता ने वरिष्ठ पशु-अधिकार कार्यकर्ता एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी को खुला पत्र लिखकर इस विषय पर वैज्ञानिक और कानूनी तथ्यों को सामने रखा है।

     

    पूर्व मानद वन्य जीव प्रतिपालक अनिल कुमार जैन  ने कहा है कि वर्ष 1992 में स्थापित पीपल फॉर एनिमल्स संस्था ने पशु कल्याण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य किए हैं और स्वयं उन्हें भी संस्था के साथ कार्य करने का अवसर मिला था। हालांकि, उन्होंने कहा कि उनका प्रमुख कार्यक्षेत्र वन्यजीव संरक्षण से जुड़ा रहा है।

    खुले पत्र में मोरपंख के संबंध में विस्तार से जानकारी देते हुए बताया गया है कि भारतीय मोर (पावो क्रिस्टेटस) भारत का राष्ट्रीय पक्षी है और उसके सजावटी पंख प्रजनन प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं। प्रजनन काल समाप्त होने के बाद अगस्त से अक्टूबर के बीच ये पंख प्राकृतिक रूप से झड़ जाते हैं। वैज्ञानिक भाषा में इस प्रक्रिया को ‘मोल्टिंग’ कहा जाता है।

    पत्र में दावा किया गया है कि प्राकृतिक रूप से झड़ने वाले पंखों से मोर को किसी प्रकार की पीड़ा नहीं होती। लेखक के अनुसार जंगलों, खेतों और मोर बहुल क्षेत्रों में बड़ी संख्या में ऐसे पंख स्वाभाविक रूप से प्राप्त हो जाते हैं, जिन्हें स्थानीय लोग वर्षों से एकत्रित करते रहे हैं।

    जैन ने यह भी उल्लेख किया कि जैन साधुओं की पीछी सहित अनेक धार्मिक परंपराओं में उपयोग होने वाले मोरपंख प्राकृतिक रूप से गिरे हुए पंखों से बनाए जाते हैं। इसके अलावा देश के विभिन्न मंदिरों में भी पूजा-अर्चना और सेवा कार्यों में मोरपंखों का उपयोग किया जाता है।

    पत्र में मेनका गांधी से आग्रह किया गया है कि किसी भी धार्मिक परंपरा या समुदाय के संबंध में सार्वजनिक टिप्पणी करने से पूर्व उसके वैज्ञानिक, कानूनी और व्यावहारिक पहलुओं का समुचित अध्ययन किया जाना चाहिए। साथ ही पशु संरक्षण से जुड़े वास्तविक और गंभीर मुद्दों पर अधिक ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता भी बताई गई है।

    यह खुला पत्र सामने आने के बाद मोरपंख, वन्यजीव संरक्षण और धार्मिक परंपराओं से जुड़े विषयों पर नई बहस शुरू हो गई है। वहीं जैन समाज से जुड़े कई लोगों ने भी इस विषय पर तथ्यात्मक चर्चा की आवश्यकता पर जोर दिया है।

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