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    यूआईटी की सुस्ती से थमा अलवर का विकास, भूमाफिया और बिल्डरों को मिला बाजार, आम आदमी के घर का सपना हुआ महंगा

    दशकों तक अटकी रहीं यूआईटी आवासीय योजनाएं, बढ़े प्लॉटों के दाम; भूमाफिया और निजी कॉलोनाइजरों को मिला विस्तार का अवसर

    विजय यादव, मिशन सच, अलवर।

    अलवर शहर का नियोजित विकास पिछले तीन दशकों में जिस गति से होना चाहिए था, वह नहीं हो सका। शहरी विकास से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि नगर विकास न्यास (यूआईटी) की कई प्रमुख आवासीय योजनाओं में वर्षों तक हुई देरी और नई योजनाओं के समय पर नहीं आने से शहर का विस्तार असंतुलित हो गया। इसका परिणाम यह हुआ कि वैध आवासीय भूखंडों की कमी बढ़ी, प्लॉटों की कीमतों में लगातार उछाल आया और निजी कॉलोनाइजरों तथा अवैध कॉलोनियों का तेजी से विस्तार हुआ।
    सबसे अधिक असर उन मध्यमवर्गीय परिवारों पर पड़ा, जिनके लिए अपना घर खरीदना या बनाना पहले की तुलना में कहीं अधिक महंगा हो गया।
    रोहिणी, साकेत और एमआईए वर्षों तक रहीं अधूरी
    अलवर की रोहिणी नगर, साकेत नगर और एमआईए जैसी महत्वपूर्ण योजनाएं लंबे समय तक विभिन्न कारणों से पूरी गति नहीं पकड़ सकीं। इन परियोजनाओं में विलंब का असर केवल संबंधित क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे शहर के आवासीय विकास पर पड़ा। शहरी योजनाकारों का कहना है कि बढ़ती आबादी के अनुरूप यदि समय पर नई सरकारी आवासीय योजनाएं विकसित नहीं होतीं, तो बाजार में मांग और आपूर्ति का संतुलन बिगड़ना स्वाभाविक है।
    दो दशक तक नहीं आई कोई बड़ी योजना
    यूआईटी ने 1990 के दशक में सूर्य नगर, वैशाली नगर और आंबेडकर नगर जैसी योजनाएं विकसित की थीं। इसके बाद लगभग दो दशक तक कोई बड़ी आवासीय योजना सामने नहीं आई। बाद में शालीमार योजना और विज्ञान नगर शुरू हुईं, लेकिन तब तक शहर के बाहरी क्षेत्रों में निजी कॉलोनियों और कई स्थानों पर अवैध बस्तियों का तेजी से विस्तार हो चुका था।
    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस अवधि में चरणबद्ध तरीके से नई योजनाएं लाई जातीं, तो शहर का विकास अधिक संतुलित और व्यवस्थित हो सकता था।
    निजी क्षेत्र और भूमाफियाओं को मिला अवसर
    आवासीय भूखंडों की कमी के कारण निजी कॉलोनाइजरों और बिल्डरों की मांग बढ़ी। अधिकांश स्वीकृत परियोजनाओं ने बाजार की जरूरत पूरी की, लेकिन दूसरी ओर कई स्थानों पर कृषि भूमि की प्लॉटिंग कर बिना पर्याप्त आधारभूत सुविधाओं वाली कॉलोनियां भी विकसित होती चली गईं।
    इन क्षेत्रों में बाद में रहने वाले लोगों को सड़क, सीवरेज, पेयजल और अन्य मूलभूत सुविधाओं के लिए वर्षों तक इंतजार करना पड़ा।
    महंगे होते गए प्लॉट
    सरकारी योजनाओं की सीमित उपलब्धता के कारण वैध प्लॉटों की संख्या अपेक्षाकृत कम रही। मांग लगातार बढ़ने से भूखंडों की कीमतों में कई गुना वृद्धि हुई। इसका सबसे अधिक असर मध्यम एवं निम्न आय वर्ग के परिवारों पर पड़ा। अनेक लोगों ने निजी कॉलोनियों का रुख किया, जबकि हजारों परिवारों के लिए अपना घर बनाने का सपना लगातार दूर होता गया।
    नई योजनाएं भी पूरी तरह विकसित नहीं
    लंबे इंतजार के बाद शुरू हुई शालीमार और विज्ञान नगर जैसी योजनाओं में भी कई स्थानों पर सड़क, सीवरेज, पेयजल, स्ट्रीट लाइट और अन्य आधारभूत सुविधाएं अभी पूरी तरह विकसित नहीं हो सकी हैं। इससे यह सवाल उठ रहा है कि भविष्य की आवासीय योजनाओं का विकास किस गति से होगा।
    नियोजित विकास की चुनौती
    शहरी विकास विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी शहर का नियोजित विस्तार केवल भूमि आवंटन तक सीमित नहीं होता। समय पर नई योजनाएं शुरू करना, पर्याप्त आवासीय भूखंड उपलब्ध कराना और सभी आधारभूत सुविधाओं का विकास भी उतना ही आवश्यक है। इन क्षेत्रों में हुई देरी का असर आज अलवर की अव्यवस्थित बसावट और बढ़ती अवैध कॉलोनियों के रूप में दिखाई दे रहा है।
    सबसे बड़ा सवाल
    आज शहर में कई सवाल चर्चा का विषय बने हुए हैं। यदि रोहिणी नगर, साकेत नगर और एमआईए जैसी योजनाएं समय पर पूरी हो जातीं और यूआईटी बढ़ती आबादी के अनुसार नियमित रूप से नई आवासीय योजनाएं लाता, तो क्या शहर में वैध प्लॉटों की इतनी कमी होती? क्या निजी और अवैध कॉलोनियों का विस्तार इसी गति से होता? क्या प्लॉटों की कीमतें इतनी तेजी से बढ़तीं? और क्या आज भी हजारों परिवारों को अपने घर का सपना पूरा करने के लिए क्षमता से कहीं अधिक कीमत चुकानी पड़ती?

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