
लेखक: श्री सुनंद
वो जलियाँवाला बाग था,
सन् उन्नीस सौ उन्नीस का साल था,
अंग्रेज़ी हुकूमत का काल था।
अन्याय के विरुद्ध जनसैलाब था,
शांति का एक प्रदर्शन था।
पर सामने जनरल डायर था,
जिसके हाथों में सत्ता का अहंकार था।
गोलियों की गूँज से
आवाज़ों को दबाया जा रहा था।
भागते कदम, चीखती साँसें,
हर ओर मौत का मंजर था।
खून से भीगी धरती पूछ रही थी—
क्या यही इंसाफ़ का सफ़र था?
बीस जुलाई, दो हज़ार छब्बीस का दिन था।
लोकतंत्र के प्रतीक जंतर-मंतर का स्थान था।
युवाओं के हाथों में उम्मीद थी,
होंठों पर सवाल थे।
शांति का मार्च था,
संविधान पर विश्वास था।
लेकिन शांति मार्च की आवाज़ को
लाठीचार्ज और अश्रुगैस के धुएँ में
फिर दबाया जा रहा था।
भागते कदम, चीखती आवाज़ें,
अफरा-तफरी का वही दृश्य था।
फ़र्क बस इतना था—
डर अब जनता को नहीं,
सत्ता को हो रहा था।
आज न जनरल डायर था,
न अंग्रेज़ी राज था,
फिर भी लोकतंत्र कई प्रश्नों से घिरा हुआ था।
क्या असहमति की पूरी आज़ादी,
क्या बिना भय के हर आवाज़ को सुना जा रहा था?
इतिहास और वर्तमान
आमने-सामने खड़ा था।
लोग भी अपने थे,
भारत भी अपना था।
चेहरे बदल गए थे,
वक़्त बदल गया था,
पर कुछ सवाल आज भी
उत्तर की प्रतीक्षा में खड़े था।
वो जलियाँवाला बाग था,
सन् उन्नीस सौ उन्नीस का साल था।
यह जंतर-मंतर था,
दो हज़ार छब्बीस का वर्तमान था।
इतिहास आज भी याद दिला रहा था कि
लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति
हथियार नहीं,
संवाद और असहमति का सम्मान था।
ईमेल – singh.sunand071@gmail.com

