सरिता भारत, अलवर
सामाजिक कार्यकर्ता, साहित्यकार
एक वक्त आएगा, जब उन्हें भी सड़कों पर उतरना होगा, जो आज इंकलाब के रास्ते से बचते हैं, जो संघर्ष से दूर रहकर यह सोचते हैं कि अन्याय की आँच कभी उनके दरवाजे तक नहीं पहुँचेगी। लेकिन याद रखिए, जब अन्याय व्यवस्था का चरित्र बन जाए, जब असमानता समाज की नींव में बैठ जाए और जब सत्ता जनता की आवाज सुनना बंद कर दे, तब कोई भी हमेशा खामोश रहकर सुरक्षित नहीं रह सकता।
आज दिल्ली की सड़कों पर मजदूर, मेहनतकश, दलित, वंचित, हाशिए के समुदायों के नौजवान और श्रमशील जातियों के बच्चे अपने हक-अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ये वही लोग हैं, जिनके माता-पिता ने दिन-रात मजदूरी करके, अपना पेट काटकर, कर्ज लेकर और अपनी पूरी जिंदगी की कमाई दाँव पर लगाकर बच्चों को पढ़ने के लिए भेजा। किसी ने देश के भीतर तो किसी ने विदेश तक से उम्मीदें जोड़ीं, ताकि उनके बच्चों का भविष्य बेहतर हो सके। लेकिन शिक्षा पूरी करने के बाद भी जब रोजगार नहीं मिलता, जब डिग्रियाँ हाथ में होती हैं और भविष्य अंधकार में दिखाई देता है, तब उस दर्द को समझना जरूरी है।
यह संघर्ष केवल नौकरी पाने का संघर्ष नहीं है, यह सम्मान के साथ जीने के अधिकार का संघर्ष है।
इन नौजवानों के भीतर बहुत सारे दर्द हैं। भूख का दर्द, बेरोजगारी का दर्द, महँगाई का दर्द और रोजी-रोटी, कपड़ा तथा मकान की चिंता का दर्द। विश्वविद्यालयों में व्याप्त गैरबराबरी, जातिगत भेदभाव, छुआछूत और अवसरों की असमानता का दर्द। भर्ती प्रक्रियाओं में कथित धांधली, भ्रष्टाचार और मेहनत के बावजूद अवसर न मिलने की पीड़ा। लिंग आधारित भेदभाव और जातिवादी मानसिकता के विरुद्ध संघर्ष का दर्द। हिंसा और बलात्कार से पीड़ित महिलाओं को न्याय न मिलने का दर्द। ये तमाम पीड़ाएँ मिलकर एक ऐसे आक्रोश को जन्म देती हैं, जिसे केवल भाषणों और आश्वासनों से शांत नहीं किया जा सकता।
यह उन माता-पिताओं का दर्द है, जिन्होंने अपनी हड्डियाँ गलाकर बच्चों को पढ़ाया, लेकिन आज उनके सामने यह सवाल खड़ा है कि आखिर उनकी मेहनत का परिणाम क्या हुआ? क्या शिक्षा केवल डिग्री हासिल करने का नाम है? क्या मेहनतकश परिवारों के बच्चों को बेहतर भविष्य का सपना देखने का अधिकार नहीं है? क्या सामाजिक न्याय और समान अवसर केवल संविधान के पन्नों तक सीमित रह जाएंगे?
यह उस व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष है, जहाँ पूँजी और मुनाफे को प्राथमिकता मिलती है, लेकिन आम इंसान की जिंदगी, उसकी जरूरतों और उसके अधिकारों को पीछे धकेल दिया जाता है। जहाँ महँगाई से जनता की कमर टूट रही है, रोजगार के अवसर सिकुड़ रहे हैं और मेहनतकश परिवार बुनियादी जरूरतों के लिए जूझ रहे हैं।
यह जल, जंगल और जमीन के उजड़ने का दर्द है। उन आदिवासियों, किसानों और स्थानीय समुदायों की पीड़ा है, जिनकी जमीन और प्राकृतिक संसाधनों पर विकास के नाम पर संकट बढ़ रहा है। सरकार जिस विकास का ढिंढोरा पीटती है, उस विकास में यदि गरीब, किसान, मजदूर, दलित, आदिवासी और वंचित समुदाय के लोगों की जिंदगी बेहतर नहीं हो रही, तो हमें पूछना होगा—यह विकास आखिर किसके लिए है और इसकी कीमत कौन चुका रहा है?
यह लोकतंत्र में जनता की आवाज कमजोर होने का दर्द है। यह चुनावों में धनबल, दबाव और राजनीतिक सौदेबाजी की आशंकाओं का दर्द है। यह नागरिक अधिकारों, सामाजिक सुरक्षा और लोकतांत्रिक मूल्यों के कमजोर पड़ने की चिंता है। यह उस मानवीय सभ्यता को बचाने की लड़ाई है, जिसकी पहचान समानता, स्वतंत्रता, न्याय, करुणा और मानवीय गरिमा से होती है।
इसलिए आज का संघर्ष किसी एक जाति, समुदाय, वर्ग या विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं है। यह उन सभी लोगों का संघर्ष है, जो एक न्यायपूर्ण समाज चाहते हैं। यह उन लोगों की आवाज है, जो चाहते हैं कि किसी बच्चे का भविष्य उसकी जाति से तय न हो, किसी नौजवान की योग्यता बेरोजगारी की भेंट न चढ़े, किसी महिला को अपनी गरिमा और सुरक्षा के लिए संघर्ष न करना पड़े और किसी मेहनतकश परिवार को दो वक्त की रोटी के लिए अपनी पूरी जिंदगी कर्ज में न गुजारनी पड़े।
हमें समझना होगा कि ,दर्द जब चेतना में बदलता है, तो संघर्ष जन्म लेता है। संघर्ष जब तर्क से जुड़ता है, तो विचार पैदा होते हैं। विचार जब संगठित होते हैं, तो परिवर्तन की ताकत बनते हैं।
जो इस दर्द से गुजरेगा, वह सवाल करेगा। जो सवाल करेगा, वह तर्क करेगा। जो तर्क करेगा, वह व्यवस्था की असमानताओं को समझेगा। जो समझेगा, वह अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाएगा। और जो अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाएगा, वह अन्याय के सामने खामोश रहना स्वीकार नहीं करेगा।
इसीलिए सड़कों पर उतरना जरूरी है। अपनी बात कहना जरूरी है। सवाल पूछना जरूरी है। संगठित होना जरूरी है। क्योंकि लोकतंत्र केवल वोट डालने का नाम नहीं, बल्कि सत्ता से जवाब माँगने, अपने अधिकारों की रक्षा करने और समाज को अधिक न्यायपूर्ण बनाने में सक्रिय भागीदारी का नाम है।
आइए, इस संघर्ष को और व्यापक बनाएँ। मजदूर और किसान, विद्यार्थी और नौजवान, महिलाएँ और सामाजिक न्याय के पक्षधर, दलित, आदिवासी, पिछड़े, वंचित और मेहनतकश समुदाय—सब एक-दूसरे के संघर्ष को अपना संघर्ष समझें। एक-दूसरे की आवाज बनें और एक ऐसी एकजुटता का निर्माण करें, जिसे न जाति की दीवारें बाँट सकें, न धर्म के नाम पर फैलाया गया विभाजन और न ही सत्ता का दबाव कमजोर कर सके।
हमारी लड़ाई किसी इंसान से नफरत करने की नहीं, बल्कि अन्याय, शोषण, भेदभाव और असमानता को चुनौती देने की है। हमारी ताकत हिंसा में नहीं, बल्कि विचार, तर्क, संगठन, एकजुटता और लोकतांत्रिक जनसंघर्ष में है।
आइए, सामाजिक न्याय के लिए बोलें।रोजगार के अधिकार के लिए बोलें।शिक्षा में समानता के लिए बोलें।
महिलाओं की गरिमा और सुरक्षा के लिए बोलें।
मजदूरों, किसानों और मेहनतकशों के अधिकारों के लिए बोलें।
जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए बोलें।
सामाजिक सुरक्षा और मानवीय गरिमा के लिए बोलें।
संविधान और लोकतंत्र की रक्षा के लिए बोलें।
आइए, इस लड़ाई को मजबूती प्रदान करें। अपने दर्द को सामूहिक चेतना में, अपनी चेतना को संगठन में और अपने संगठन को परिवर्तन की ताकत में बदलें।
क्योंकि जब जनता अपने अधिकारों के लिए जागती है, जब नौजवान सवाल पूछते हैं और जब मेहनतकश लोग एकजुट होकर अन्याय को चुनौती देते हैं, तब बदलाव की संभावनाएँ मजबूत होती हैं।सबको सड़कों पर आना होगा!
सबको अपनी आवाज उठानी होगी!
सामाजिक न्याय और समानता के लिए संघर्ष करना होगा!
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