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    Homeराज्यगुजरातसिद्धक्षेत्र पावागढ़ के संरक्षण हेतु आचार्य सुनील सागर महाराज का प्रखर आह्वान

    सिद्धक्षेत्र पावागढ़ के संरक्षण हेतु आचार्य सुनील सागर महाराज का प्रखर आह्वान

    “प्राचीन धरोहरों का संरक्षण ही नहीं, समयानुकूल जीर्णोद्धार भी आवश्यक”

    पावागढ़ (गुजरात)। विश्वविख्यात जैन सिद्धक्षेत्र पावागढ़ की पावन वंदना के अवसर पर परम पूज्य प्राकृताचार्य चतुर्थ पट्टाचार्य आचार्य सुनील सागर महाराज ने सिद्धभूमि पावागढ़ से जैन समाज, शासन-प्रशासन एवं पुरातत्व विभाग का ध्यान क्षेत्र की उपेक्षित प्राचीन धरोहरों की ओर आकर्षित करते हुए उनके संरक्षण एवं जीर्णोद्धार की आवश्यकता पर बल दिया।

    पावागढ़ सिद्धक्षेत्र आचार्य सुनील सागर महाराज
    पावागढ़ सिद्धक्षेत्र आचार्य सुनील सागर महाराज

    जैन पत्रकार महासंघ के राष्ट्रीय सांस्कृतिक मंत्री संजय जैन बड़जात्या के प्रश्नों का उत्तर देते हुए आचार्य श्री ने कहा कि किसी भी समाज की वास्तविक पहचान उसकी संस्कृति, परंपरा और प्राचीन धरोहरों से होती है। मंदिर, तीर्थ और ऐतिहासिक स्मारक केवल पत्थरों की संरचनाएँ नहीं, बल्कि गौरवशाली अतीत, आध्यात्मिक चेतना और सांस्कृतिक विरासत के जीवंत साक्ष्य हैं। यदि इनका समय रहते संरक्षण एवं जीर्णोद्धार नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ियां अपने इतिहास और मूल पहचान से वंचित हो जाएंगी।

    उन्होंने कहा कि पावागढ़ कोई सामान्य भूमि नहीं, बल्कि असंख्य संतों-मुनियों की तपःस्थली और सिद्धभूमि है। यह क्षेत्र जैन धर्म के लिए अत्यंत श्रद्धा और आस्था का केंद्र है। पर्वत पर स्थित अनेक प्राचीन जैन मंदिर आज भी अपने गौरवशाली इतिहास की गाथा सुनाते हैं, किंतु इनमें से कई मंदिर उपेक्षा और समय के प्रभाव के कारण जीर्ण अवस्था में पहुंच चुके हैं।

    आचार्य श्री ने प्रश्न उठाया कि जब सरकार विभिन्न धार्मिक एवं सांस्कृतिक स्थलों के विकास और संरक्षण पर करोड़ों रुपये व्यय कर सकती है, तो जैन समाज की अमूल्य धरोहरों के संरक्षण के लिए भी समुचित प्रयास क्यों नहीं किए जा सकते। उन्होंने कहा कि धार्मिक विरासत किसी एक समाज की नहीं, बल्कि सम्पूर्ण राष्ट्र की सांस्कृतिक संपदा होती है और उसका संरक्षण सभी की जिम्मेदारी है।

    उन्होंने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई), गुजरात सरकार तथा संबंधित विभागों से आग्रह किया कि पावागढ़ पर्वत पर स्थित सात उपेक्षित जैन मंदिरों की वास्तविक स्थिति का गंभीरता से अध्ययन कर उनके संरक्षण एवं जीर्णोद्धार की ठोस योजना बनाई जाए। यदि विभाग स्वयं जीर्णोद्धार कराने में सक्षम नहीं है, तो जैन समाज को आवश्यक स्वीकृति प्रदान की जाए ताकि समाज अपने संसाधनों और श्रद्धा के बल पर इन प्राचीन मंदिरों का संरक्षण कर सके।

    आचार्य श्री ने कहा कि मंदिरों की वर्तमान स्थिति देखकर मन अत्यंत व्यथित होता है। नूतनता के साथ प्राचीनता को सहेजना और उनका संरक्षण करना हमारी जिम्मेदारी है, क्योंकि यही हमारी धरोहर और पहचान है।

    पावागढ़ सिद्धक्षेत्र पर स्थित सात प्राचीन जिनालय

    1. श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर
    2. श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर
    3. श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर
    4. श्री चन्द्रप्रभु दिगम्बर जैन मंदिर
    5. श्री सुपार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर
    6. श्री लव कुश मुनि चरण चिन्ह
    7. श्री शांतिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर

    आचार्य श्री ने स्पष्ट किया कि संरक्षण का अर्थ केवल पुराने भवनों को यथावत बनाए रखना नहीं है, बल्कि उनकी मूल प्राचीनता और ऐतिहासिक स्वरूप को सुरक्षित रखते हुए उन्हें भविष्य के लिए सुदृढ़ बनाना भी है। जीर्णोद्धार ऐसा हो जिससे मंदिरों की प्राचीन पहचान अक्षुण्ण रहे और आने वाली पीढ़ियां हजारों वर्षों तक इस जीवंत इतिहास का दर्शन कर सकें।

    उन्होंने जैन समाज के सभी संगठनों, तीर्थ समितियों, समाजसेवियों एवं धर्मप्रेमी बंधुओं से भी जागरूक होने का आह्वान करते हुए कहा कि यदि समाज अपनी धरोहरों के प्रति सजग रहेगा तो कोई भी ऐतिहासिक विरासत उपेक्षा का शिकार नहीं होगी। तीर्थों का संरक्षण केवल धार्मिक दायित्व नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और राष्ट्रीय उत्तरदायित्व भी है।

    आचार्य श्री ने कहा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि समाज, संत समाज, प्रशासन और पुरातत्व विभाग मिलकर ऐसी कार्ययोजना तैयार करें जिससे पावागढ़ सहित देशभर के प्राचीन जैन तीर्थों का संरक्षण, संवर्धन और जीर्णोद्धार सुनिश्चित हो सके। इससे न केवल धार्मिक आस्था को बल मिलेगा, बल्कि भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत भी सुरक्षित रह सकेगी।

    उन्होंने कहा कि यह संदेश केवल पावागढ़ तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के सभी प्राचीन जैन तीर्थों के संरक्षण एवं संवर्धन का व्यापक आह्वान है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए हमारी अमूल्य धरोहरों को सुरक्षित रखने की प्रेरणा देता है।

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