जबलपुर। मध्य प्रदेश में अध्यापक संवर्ग के हजारों शिक्षकों को छठे वेतनमान और पुरानी सेवा अवधि के एरियर का लाभ न दिए जाने के मामले में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार के प्रति बेहद कड़ा रुख अपनाया है। पूर्व में पारित अदालती आदेश का क्रियान्वयन न होने पर नाराजगी जताते हुए न्यायमूर्ति दीपक खोत की एकलपीठ ने अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए शासन को सख्त चेतावनी जारी की है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि आगामी सुनवाई तक पूर्व आदेशों का पालन सुनिश्चित नहीं किया गया, तो स्कूल शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव को व्यक्तिगत रूप से हाईकोर्ट में हाजिर होना पड़ेगा।
चार सौ सत्तानवे शिक्षकों ने लगाई अवमानना याचिका
जबलपुर निवासी राजेश कुमार पांडेय सहित कुल चार सौ सत्तानवे शिक्षकों द्वारा दायर की गई इस अवमानना याचिका में बताया गया कि उनकी शुरुआती नियुक्ति पंचायत विभाग के अंतर्गत हुई थी, जिसके बाद वर्ष दो हजार छह में उनका संविलियन अध्यापक संवर्ग में किया गया। बाद में वर्ष दो हजार अठारह में उन्हें स्कूल शिक्षा विभाग में शामिल कर लिया गया। शासन द्वारा शिक्षकों को वर्ष दो हजार सोलह से छठा वेतनमान देने का निर्णय लिया गया था, जिसके खिलाफ शिक्षकों ने अदालत की शरण ली थी और हाईकोर्ट ने दो हजार छह से ही इसका लाभ देने का स्पष्ट निर्देश दिया था।
सर्वोच्च न्यायालय से खारिज हो चुकी है राज्य सरकार की अपील
अदालती आदेश को चुनौती देने के लिए राज्य सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका दायर की थी, जिसे उच्चतम न्यायालय ने चौबीस अगस्त दो हजार छब्बीस को खारिज कर दिया था। इसके बावजूद आदेश का पालन न होने पर शिक्षकों को अवमानना याचिका दायर करनी पड़ी। पूर्व में दिए गए चार सप्ताह के अतिरिक्त समय की सीमा समाप्त होने के बाद भी जब शासन ने कदम नहीं उठाए, तो उच्च न्यायालय ने अधिवक्ता जितेंद्र आर्य की दलीलों को गंभीरता से लेते हुए सरकार को अनुपालन के लिए यह अंतिम अवसर प्रदान किया है।


