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    भोपाल में 50 हजार शिक्षकों की हुंकार: “25 साल की सेवा के बाद अब परीक्षा की कैसी शर्त?”

    भोपाल |  मध्य प्रदेश में शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) की अनिवार्यता को लेकर छिड़ा संग्राम अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। शनिवार को राजधानी भोपाल का भेल दशहरा मैदान उस समय शिक्षकों के आक्रोश का गवाह बना, जब 'अध्यापक शिक्षक संयुक्त मोर्चा' के आह्वान पर हजारों की संख्या में शिक्षक 'मुख्यमंत्री अनुरोध यात्रा' में शामिल होने पहुंचे। आयोजकों का दावा है कि इस विरोध प्रदर्शन में प्रदेश के विभिन्न कोनों से आए लगभग 50,000 शिक्षकों ने हिस्सा लेकर अपनी एकजुटता का परिचय दिया।

    वरिष्ठता के अपमान का आरोप: 'दशकों के अनुभव पर परीक्षा भारी क्यों?'

    आंदोलनरत शिक्षकों का मुख्य विरोध वर्षों की सेवा के बाद थोपी जा रही TET की शर्त को लेकर है। उनका कहना है कि जो शिक्षक पिछले दो से तीन दशकों से अपनी सेवाएं दे रहे हैं, उन पर करियर के इस पड़ाव पर पात्रता परीक्षा अनिवार्य करना न्यायसंगत नहीं है। शिक्षक नेताओं के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट के हालिया रुख से करीब 95 प्रतिशत अध्यापक प्रभावित हो रहे हैं। विशेषकर वे शिक्षक जो संवर्ग परिवर्तन के दौर से गुजरे हैं, वे अब अपने भविष्य को लेकर गहरे संशय में हैं।

    आर्थिक हितों पर चोट और सरकार की कानूनी पहल

    शिक्षकों ने स्पष्ट किया कि मामला केवल परीक्षा का नहीं, बल्कि उनके आर्थिक अधिकारों का भी है। सेवा गणना में हो रही त्रुटियों के कारण उनकी पेंशन, वेतनमान और ग्रेच्युटी पहले ही प्रभावित हो रही है। इस बीच, राज्य सरकार ने भी अपना रुख साफ करते हुए इस मामले को कानूनी पटल पर ले जाने का फैसला किया है। शासन द्वारा 17 अप्रैल को सर्वोच्च न्यायालय में एक पुनर्विचार याचिका दायर की गई है, जिससे यह संकेत मिलते हैं कि सरकार अदालत के माध्यम से बीच का रास्ता तलाश रही है।

    संघर्ष का संकल्प: सड़क और न्यायालय दोनों मोर्चों पर लड़ाई

    शिक्षक संगठनों ने दो टूक शब्दों में कहा है कि जब तक TET का दबाव पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाता, उनका आंदोलन विराम नहीं लेगा। भले ही सरकार ने कोर्ट में याचिका लगाई हो, लेकिन शिक्षकों का जमीनी विरोध जारी रहेगा। उल्लेखनीय है कि TET वर्ष 2010 से प्रभावी हुई एक राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा है, जिसे प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षकों के मानक तय करने के लिए लागू किया गया था, लेकिन अब यह पुराने अनुभवी शिक्षकों के लिए गले की फांस बन गई है।

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