जल संरक्षण का संदेश देते हुए आरएएस जितेंद्र नरूका ने की पर्यावरण अनुकूल गणेश चतुर्थी मनाने की अपील
अलवर। गणेश चतुर्थी का पर्व पूरे देश में श्रद्धा, उत्साह और उल्लास के साथ मनाया जाता है। भक्त अपने घरों और प्रतिष्ठानों में भगवान गणेश की प्रतिमाएं स्थापित करते हैं और अनंत चतुर्दशी के दिन उनका विसर्जन करते हैं। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में प्लास्टर ऑफ पेरिस (पीओपी) और रासायनिक रंगों से बनी प्रतिमाओं के कारण नदियों, तालाबों और अन्य जल स्रोतों में प्रदूषण की समस्या लगातार बढ़ती जा रही है।
इसी समस्या के समाधान के लिए पर्यावरण संरक्षण और धार्मिक आस्था को एक साथ जोड़ने वाली एक नई पहल सामने आई है। यूआईटी के भूमि अवाप्ति अधिकारी एवं आरएएस अधिकारी जितेंद्र नरूका ने आमजन से गोबर से बनी इको-फ्रेंडली गणेश प्रतिमाओं को अपनाने की अपील की है।
उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में गोबर को अत्यंत पवित्र माना जाता है। यही कारण है कि गोबर से निर्मित प्रतिमाएं धार्मिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हैं और पर्यावरण के लिए भी पूरी तरह सुरक्षित हैं।
जल संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण पहल
आरएएस जितेंद्र नरूका ने कहा कि गणेश प्रतिमाओं के पारंपरिक विसर्जन से जल स्रोतों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। रासायनिक रंगों और पीओपी से बनी मूर्तियां जल को प्रदूषित कर देती हैं, जिससे जलीय जीवों के साथ-साथ मानव जीवन भी प्रभावित होता है।
उन्होंने कहा कि गोबर से बनी प्रतिमाओं को जल में विसर्जित करने की आवश्यकता नहीं होती। इन्हें घर के आंगन, बगीचे या गमले में स्थापित कर प्रकृति को समर्पित किया जा सकता है।
इस प्रकार करें इको-फ्रेंडली प्रतिमाओं का विसर्जन
- पूजा-अर्चना पूरी होने के बाद प्रतिमा को किसी गमले या पेड़ के नीचे रखें।
- नियमित रूप से उसमें पानी डालें।
- कुछ समय बाद प्रतिमा प्राकृतिक रूप से मिट्टी में मिल जाएगी।
- गोबर प्राकृतिक खाद के रूप में पौधों को पोषण प्रदान करेगा।
पर्यावरण संरक्षण का संदेश
यह पहल केवल जल संरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक करने का भी एक प्रभावी माध्यम बन रही है। इससे न केवल प्रदूषण कम होगा, बल्कि वृक्षारोपण और हरित वातावरण को भी बढ़ावा मिलेगा।
आरएएस जितेंद्र नरूका ने लोगों से अपील करते हुए कहा कि इस बार गणेश चतुर्थी पर सभी लोग पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लें और गोबर से बनी प्रतिमाओं का उपयोग करें, ताकि धार्मिक परंपराओं के साथ-साथ प्रकृति का संतुलन भी बना रहे।
उन्होंने कहा, “पर्यावरण और जल संरक्षण के साथ गणेश चतुर्थी मनाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। हमें आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वच्छ और सुरक्षित वातावरण छोड़ना होगा।”
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