More
    Homeराजस्थानखैरथलजल संरक्षण से सामाजिक समरसता तक, खैरथल-तिजारा में किताब ने सुनाई गांवों...

    जल संरक्षण से सामाजिक समरसता तक, खैरथल-तिजारा में किताब ने सुनाई गांवों के इतिहास की कहानी

    पूर गांव की विरासत और विस्थापित परिवारों के संघर्ष का इतिहास, ‘राजस्थान के पूर गांव, कल गांव और तिजारा’ पुस्तक का विमोचन

    खैरथल-तिजारा। भारत छोड़ो आंदोलन दिवस के अवसर पर खैरथल-तिजारा जिले के कल गांव और गोबिंदगढ़ में “राजस्थान के पूर गांव, कल गांव और तिजारा: जल, समाज और इतिहास की यात्रा” पुस्तक का विमोचन एवं चर्चा कार्यक्रम आयोजित किया गया। पुस्तक के विमोचन के साथ जल संरक्षण, ग्रामीण समाज, विस्थापन, पुनर्वास और सामाजिक समरसता से जुड़े विषयों पर चर्चा हुई।

    पुस्तक के लेखक एवं भारत ज्ञान विज्ञान समिति के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ. काशी नाथ चटर्जी ने बताया कि पुस्तक का मुख्य केंद्र पूर गांव के ऐतिहासिक तालाब का पुनरुद्धार है। इसके साथ ही कल गांव और गोबिंदगढ़ से जुड़े सामाजिक एवं ऐतिहासिक पहलुओं पर दो विशेष अध्याय पुस्तक में शामिल किए गए हैं।

    डॉ. चटर्जी ने कहा कि देश विभाजन के बाद पश्चिमी पंजाब और सिंध से विस्थापित होकर इन क्षेत्रों में पहुंचे परिवारों के संघर्ष, पुनर्वास और स्थानीय समाज के साथ उनके जुड़ाव को भी पुस्तक में दर्ज किया गया है। उन्होंने कहा कि इन समुदायों ने शून्य से शुरुआत करते हुए स्थानीय समाज के साथ घुल-मिलकर नया जीवन गढ़ा। यही संघर्ष और सामाजिक समरसता पुस्तक की केंद्रीय विषय-वस्तु है।

    जल संरक्षण के साथ सामाजिक समरसता की कहानी

    डॉ. चटर्जी ने कहा कि पुस्तक केवल किसी तालाब या गांव के इतिहास तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जल संरक्षण के साथ सामाजिक समरसता की कहानी भी सामने लाती है। उन्होंने कहा कि आज के समय में जल संरक्षण और सामाजिक एकजुटता दोनों ही बेहद महत्वपूर्ण विषय हैं।

    उन्होंने बताया कि गांवों में रहकर और स्थानीय लोगों से संवाद करते हुए पुस्तक की सामग्री तैयार की गई है। इससे इसमें दर्ज घटनाओं और अनुभवों को जमीनी दृष्टिकोण मिला है।

    कल गांव में हुई पुस्तक पर चर्चा

    कल गांव में आयोजित कार्यक्रम का संचालन जगदीश बैरागी ने किया। इस दौरान भारत ज्ञान विज्ञान समिति हरियाणा के अध्यक्ष प्रो. प्रमोद गौरी ने कहा कि पुस्तक में राजस्थान के ग्रामीण समाज के साथ पश्चिमी पंजाब से आए विस्थापित परिवारों के संघर्ष, मेहनत और उत्थान का सजीव चित्रण किया गया है।

    भारत ज्ञान विज्ञान समिति राजस्थान के पूर्व महासचिव अनिल जी ने कहा कि लेखक ने गांव में रहकर पुस्तक लिखी है। ऐसे में यह केवल इतिहास का संकलन नहीं, बल्कि जमीनी अनुभवों का जीवंत दस्तावेज बन गई है।

    गोबिंदगढ़ में विस्थापित परिवारों की कहानी पर चर्चा

    गोबिंदगढ़ में आयोजित संध्याकालीन सत्र में भारत ज्ञान विज्ञान समिति राजस्थान के पूर्व राज्य अध्यक्ष अशोक गुगनानी ने पुस्तक की विषय-वस्तु पर चर्चा करते हुए कहा कि गोबिंदगढ़ से जुड़े पश्चिमी पंजाब के विस्थापित परिवारों की कहानी को पुस्तक में महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है।

    भारत ज्ञान विज्ञान समिति के कार्यकर्ता धर्मवीर जी ने लेखक को पुस्तक के लिए बधाई देते हुए कहा कि जमीनी संवादों और लोगों के अनुभवों को पुस्तक में प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया गया है।

    वहीं दिलीप सिंह चौहान ने कहा कि उनके आग्रह पर ही यह पुस्तक लिखी गई और अब इसका विमोचन दो गांवों में होना गर्व की बात है। उन्होंने कहा कि पुस्तक के माध्यम से क्षेत्र के सामाजिक और ऐतिहासिक पक्ष को व्यापक स्तर पर सामने लाने का अवसर मिला है।

    धनबाद में हो चुका है पहला विमोचन

    उल्लेखनीय है कि इस पुस्तक का पहला विमोचन धनबाद के सिंदरी ऑफिसर क्लब में बुद्धिजीवियों की मौजूदगी में हो चुका है। राजस्थान में कल गांव और गोबिंदगढ़ में पुस्तक के विमोचन एवं चर्चा कार्यक्रम के बाद जल संरक्षण और सामाजिक इतिहास से जुड़े विषयों पर नई चर्चा शुरू हुई है।

    पुस्तक के माध्यम से गांवों के तालाब, जल संरक्षण, विभाजन के बाद विस्थापित परिवारों के पुनर्वास और स्थानीय समाज में उनके समायोजन की कहानी को एक साथ प्रस्तुत किया गया है। आयोजकों का मानना है कि यह प्रयास हिंदी प्रदेशों में जल संरक्षण और सामाजिक इतिहास को लेकर नई चेतना पैदा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

    मिशनसच न्यूज के लेटेस्ट अपडेट पाने के लिए हमारे व्हाट्सप्प ग्रुप को जॉइन करें।
    https://chat.whatsapp.com/JX13MOGfl1tJUvBmQFDvB1

    अन्य खबरों के लिए देखें मिशनसच नेटवर्क

    https://missionsach.com/category/india

    latest articles

    explore more

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here