भारतीय ज्ञान परंपरा के षट्खण्डागम सहित ग्रंथों का संग्रह, सिद्धांत चिंतामणि और ज्ञान चिंतामणि टीका ने खोले ज्ञान के नए आयाम
भोपाल। तुलसी मानस प्रतिष्ठान, मध्यप्रदेश द्वारा आयोजित तुलसी जयंती समारोह-2026 के अवसर पर श्री राम किंकर उपाध्याय पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र को श्रमण संस्कृति से जुड़े 50 से अधिक आधारभूत और महत्वपूर्ण शास्त्रीय ग्रंथ भेंट किए गए। इनमें लगभग दो हजार वर्ष प्राचीन षट्खण्डागम, कसायपाहुड़, आदिपुराण, उत्तरपुराण, हरिवंशपुराण सहित प्राकृत, संस्कृत और अपभ्रंश भाषाओं में रचित अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथ शामिल हैं।

इन अमूल्य ग्रंथों को सिंघई सतीशचन्द्र-केशरदेवी जैन जनकल्याण संस्थान, नैनागिरि की ओर से वरिष्ठ प्रशासक सुरेश जैन (आईएएस) एवं न्यायमूर्ति विमला जैन द्वारा पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र को प्रदान किया गया। ग्रंथों के इस संग्रह को भारतीय श्रमण संस्कृति, दर्शन और ज्ञान परंपरा के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण योगदान माना जा रहा है।
षट्खण्डागम को बताया भारतीय ज्ञान परंपरा का आधारभूत ग्रंथ
कार्यक्रम में षट्खण्डागम के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा गया कि लगभग दो हजार वर्ष पुराना यह ग्रंथ भारतीय आध्यात्मिक और दार्शनिक परंपरा का आधारभूत ग्रंथ है। यह केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन के गहन पक्षों को समझने वाली ज्ञान परंपरा का महत्वपूर्ण स्रोत है।
षट्खण्डागम को जीवन का विज्ञान और अतीत के बोध का दर्पण बताते हुए कहा गया कि यह भारतीय ज्ञान परंपरा के आद्य ग्रंथों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इसके संदेश को केवल मंदिरों तक सीमित रखने के बजाय दैनिक व्यवहार और जीवन में आत्मसात करने की आवश्यकता है।
इसके माध्यम से व्यक्ति अपने दुर्गुणों को दूर कर नैतिक एवं मानसिक रूप से सशक्त बन सकता है। साथ ही भौतिक, आध्यात्मिक, मानसिक और भावनात्मक विकास की दिशा में भी यह मार्गदर्शन प्रदान करता है।
सिद्धांत चिंतामणि और ज्ञान चिंतामणि टीका ने खोले नए आयाम
कार्यक्रम में परम पूज्य गणिनी ज्ञानमती माताजी की संस्कृत में रचित ‘सिद्धांत चिंतामणि’ तथा पूज्य चंदनामती जी की आधुनिक हिंदी में रचित ‘ज्ञान चिंतामणि’ टीका के महत्व पर भी चर्चा हुई।
वक्ताओं ने कहा कि दोनों टीकाओं ने षट्खण्डागम के गूढ़ रहस्यों को प्रामाणिक रूप से सामने लाने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। दोनों विदुषी माताओं ने षट्खण्डागम के सूत्रों की विस्तृत व्याख्या करते हुए उनमें निहित गहन अर्थ को सरल रूप में प्रस्तुत किया है।
इन टीकाओं के माध्यम से प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक विज्ञान के बीच संवाद को समझना भी आसान हुआ है। विशेष रूप से भौतिकी और चेतना की अवधारणाओं के बीच तुलना एवं समन्वय की संभावनाओं को लेकर भी नए दृष्टिकोण सामने आए हैं।
दो विदुषी साध्वियों के योगदान को किया नमन
कार्यक्रम में कहा गया कि महावीर काल के लगभग 2500 वर्षों के इतिहास में साध्वी युगल द्वारा संस्कृत में ‘सिद्धांत चिंतामणि’ और हिंदी में ‘ज्ञान चिंतामणि’ जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना उल्लेखनीय उपलब्धि है।
ज्ञानमती माताजी और चंदनामती जी के साहित्यिक एवं आध्यात्मिक योगदान को भारतीय ज्ञान परंपरा के लिए महत्वपूर्ण बताते हुए उनके प्रति सम्मान व्यक्त किया गया। वक्ताओं ने कहा कि संस्कृत साहित्य के विकास में ज्ञानमती जी तथा हिंदी और अंग्रेजी साहित्य के विकास में चंदनामती जी का योगदान उल्लेखनीय है।
धवला टीका से आधुनिक टीका तक की ज्ञान यात्रा
कार्यक्रम में बताया गया कि आचार्य वीरसेन ने 8 अक्टूबर 816 को धवला टीका पूरी की थी। इसके लगभग 1190 वर्ष बाद महाकवयित्री माताजी ने 4 अप्रैल 2007 को अपने दीक्षा दिवस पर सिद्धांत चिंतामणि टीका पूर्ण की।
इस ज्ञान परंपरा को भारतीय संस्कृति के लिए गौरवपूर्ण और प्रेरणादायी यात्रा बताते हुए कहा गया कि इन ग्रंथों और टीकाओं के माध्यम से प्राचीन दर्शन को आधुनिक संदर्भों में समझने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने का कार्य हो रहा है।
राष्ट्रीय स्तर पर मनाया जा रहा षट्खण्डागम द्विसहस्राब्दी समारोह
परम पूज्य ज्ञानमती माताजी की प्रेरणा से इस वर्ष षट्खण्डागम का द्विसहस्राब्दी समारोह राष्ट्रीय स्तर पर मनाया जा रहा है। इसके अंतर्गत ग्रंथ पर आधुनिक संदर्भों में व्यापक शोध, अध्ययन और व्याख्या की जा रही है।
इस पहल का उद्देश्य भारतीय ज्ञान परंपरा के इस महत्वपूर्ण ग्रंथ को नई पीढ़ी तक पहुंचाना और उसके दार्शनिक, आध्यात्मिक तथा वैज्ञानिक पक्षों पर नए सिरे से अध्ययन को प्रोत्साहित करना है।
समारोह में ये गणमान्य रहे मौजूद
तुलसी जयंती समारोह के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में श्रद्धेय दीदी मंदाकिनी राम किंकर, पूर्व राज्यपाल कप्तान सिंह सोलंकी, पूर्व सांसद एवं प्रतिष्ठान के कार्याध्यक्ष रघुनन्दन शर्मा, पूर्व सांसद एवं तुलसी मानस के संपादक पी.डी. मिश्रा सहित अन्य गणमान्यजन उपस्थित रहे।
श्री राम किंकर उपाध्याय पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र को प्रदान किए गए इन शास्त्रीय ग्रंथों को शोधार्थियों और भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्येताओं के लिए उपयोगी बताया गया। इस पहल से श्रमण संस्कृति और प्राचीन भारतीय साहित्य के अध्ययन को नई दिशा मिलने की उम्मीद है।
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