नई दिल्ली: भारत अपनी सामरिक ताकत और निगरानी तंत्र को अभेद्य बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक छलांग लगाने जा रहा है। देश की खुफिया और सैन्य प्रणालियों को अत्याधुनिक बनाने के लिए स्वदेशी हाई-एल्टीट्यूड स्यूडो-सैटेलाइट्स (HAPS) प्रोजेक्ट पर अब युद्धस्तर पर काम शुरू हो गया है। इस तकनीक के विकसित होने से भारत बिना पड़ोसी मुल्कों की हवाई सीमा का उल्लंघन किए, दुश्मन की हर हरकत पर अंतरिक्ष जितनी दूर से लेकिन जमीन के बेहद करीब से 24 घंटे पैनी नजर रख सकेगा।
क्या हैं हाई-एल्टीट्यूड स्यूडो-सैटेलाइट्स (HAPS)?
पारंपरिक उपग्रहों (Satellites) और आम ड्रोन्स के बीच की एक मजबूत कड़ी माने जाने वाले ये विशेष विमान पूरी तरह से सौर ऊर्जा से संचालित होते हैं। ये धरती से करीब 17 से 25 किलोमीटर की ऊंचाई यानी समताप मंडल (Stratosphere) में उड़ान भरते हैं। इनकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि ये एक बार उड़ान भरने के बाद बिना उतरे लगातार कई हफ्तों या महीनों तक हवा में तैरते रह सकते हैं। सामान्य विमानों और बादलों से काफी ऊपर होने के कारण दुश्मन के रडार या लड़ाकू विमानों के लिए इन्हें भेद पाना लगभग असंभव होता है।
परीक्षण की सफलता और आगे की बड़ी योजनाएं
इस स्वदेशी रक्षा कार्यक्रम को हाल ही में एक बड़ी कामयाबी मिली है। एक छोटे सब-स्केल प्रोटोटाइप का सफल उड़ान परीक्षण पूरा करने के बाद, अब वैज्ञानिक और रक्षा एजेंसियां लगभग 30 मीटर के विशाल विंगस्पैन वाले फुल-साइज HAPS को तैयार करने में जुट गई हैं। रक्षा क्षेत्र की सर्वोच्च संस्था 'रक्षा अधिग्रहण परिषद' पहले ही भारतीय सशस्त्र बलों के लिए इस आधुनिक प्लेटफॉर्म की खरीद को हरी झंडी दे चुकी है, जिससे इसके निर्माण को और गति मिली है।
दुश्मन की सरहद में ताकझांक, पर सीमा के भीतर रहकर
HAPS का सबसे बड़ा रणनीतिक लाभ इसकी 'स्टैंड-ऑफ सर्विलांस' क्षमता और बेहद कम लागत है। भारतीय सीमा के सुरक्षित दायरे में रहकर ही लगभग 20 किलोमीटर की ऊंचाई से ये प्लेटफॉर्म अत्याधुनिक कैमरों, थर्मल सेंसर्स और सिगिंट (Signal Intelligence) उपकरणों के जरिए पड़ोसी देशों के भीतर छिपे सैन्य ठिकानों, एयरबेस और सैनिकों की गतिविधियों का लाइव डेटा जुटाएंगे। इससे अंतरराष्ट्रीय हवाई क्षेत्र के उल्लंघन का कोई राजनीतिक जोखिम भी नहीं रहेगा।
आपदा प्रबंधन और संचार क्षेत्र में भी क्रांतिकारी बदलाव
सैन्य निगरानी के अलावा, इन सौर ऊर्जा चालित विमानों का उपयोग शांति काल में नागरिक हितों के लिए भी व्यापक पैमाने पर किया जा सकेगा। बाढ़, भूकंप या अन्य प्राकृतिक आपदाओं के दौरान त्वरित राहत और बचाव कार्यों में ये बेहद मददगार साबित होंगे। इसके अलावा, सुदूर और दुर्गम इलाकों में इन्हें 'फ्लोटिंग सेल टावर' के तौर पर इस्तेमाल करके मोबाइल और इंटरनेट संचार नेटवर्क को तुरंत मजबूत किया जा सकेगा। आने वाले समय में यह तकनीक भारतीय रक्षा और सुरक्षा तंत्र की रूपरेखा को पूरी तरह बदलकर रख देगी।


