वॉशिंगटन/दुबई: पश्चिमी एशिया में जारी तनातनी के बीच स्थायी शांति की कोशिशों को गहरा झटका लगा है। अमेरिकी प्रशासन द्वारा ईरान के प्रति अपनाए गए कड़े रुख ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारी अनिश्चितता पैदा कर दी है। शीर्ष अमेरिकी नेतृत्व की तीखी बयानबाजी के तुरंत बाद वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में जबरदस्त उछाल देखा गया, जिससे अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड लगभग 90 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को छूने लगा है। ईंधन के दामों में आई इस अचानक तेजी से दुनियाभर में मुद्रास्फीति और महंगाई दर बढ़ने की नई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं।
कूटनीतिक गतिरोध और कड़े आर्थिक दांव
एक हालिया साक्षात्कार के दौरान अमेरिकी नेतृत्व ने ईरान के साथ जारी संवाद की वास्तविक स्थिति पर बात की। बयान में स्पष्ट किया गया कि ईरान की ओर से बातचीत में शामिल प्रतिनिधि दल बेहद सतर्क और आक्रामक रुख अपना रहा है। अमेरिकी रुख के अनुसार, तेहरान इस समय भीषण आर्थिक तंगी के दौर से गुजर रहा है। ईरान के विदेशी परिसंपत्तियों और वित्तीय कोषों पर अमेरिकी प्रतिबंधों की मजबूत पकड़ है, जिसके चलते उसके लिए वैश्विक बाजारों से किसी भी तरह की वित्तीय सहायता या कर्ज हासिल करना लगभग असंभव हो चुका है।
भविष्य की रणनीति के लिए दो कड़े रास्ते
वर्तमान गतिरोध से निपटने के लिए अमेरिकी पक्ष ने दो स्पष्ट राहें सामने रखी हैं:
आर्थिक शिकंजा बनाए रखना: पहला मार्ग यह है कि मौजूदा कड़े प्रतिबंधों और आर्थिक दबाव की नीति को बिना रुके जारी रखा जाए, ताकि ईरान की वित्तीय क्षमता पूरी तरह पस्त हो जाए।
सैन्य कार्रवाई का रास्ता: दूसरा विकल्प अधिक आक्रामक है, जिसके तहत यदि शांतिपूर्ण हल नहीं निकलता तो ईरान के सामरिक ठिकानों पर व्यापक स्तर पर सैन्य कार्रवाई की जा सकती है।
मध्यस्थता के दावों पर लगा विराम
यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय में बदला है जब इस्लामाबाद लगातार दोनों देशों के बीच कूटनीतिक मध्यस्थ बनने की कोशिशों में जुटा हुआ था। हाल ही में पाकिस्तानी राजनयिकों ने दावा किया था कि दोनों पक्ष किसी संभावित समझौते के बेहद करीब पहुंच चुके हैं। हालांकि, वाशिंगटन से आए इस बेहद सख्त बयान ने मध्यस्थता की तमाम उम्मीदों पर फिलहाल पानी फेर दिया है।
वैश्विक बाजारों पर असर और आर्थिक चिंताएं
तनाव की नई लहर का सीधा असर ऊर्जा बाजार पर पड़ा है। तेल विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कच्चे तेल की कीमतें इसी तरह तेज बनी रहीं, तो भारत जैसे प्रमुख तेल आयातक देशों का आयात बिल काफी बढ़ जाएगा। इसका सीधा असर आम उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ेगा और परिवहन से लेकर दैनिक उपभोग की वस्तुओं तक सब कुछ महंगा होने का खतरा मंडराने लगा है।


