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    केजरीवाल की याचिका पर गुजरात हाईकोर्ट ने सुरक्षित रखा फैसला, ₹25 हजार की लागत का मामला

    अहमदाबाद (गुजरात)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शैक्षणिक डिग्री से जुड़े बहुचर्चित कानूनी विवाद में आम आदमी पार्टी (AAP) के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल को गुजरात उच्च न्यायालय से एक बड़ा झटका लगा है। अदालत ने गुजरात विश्वविद्यालय को प्रधानमंत्री की शैक्षणिक डिग्री की जानकारी सार्वजनिक करने का निर्देश देने से जुड़ी मांग वाली केजरीवाल की अपील को मंगलवार को खारिज कर दिया।

    डिफ़ेंडर बेंच का फैसला और जुर्माना बरकरार

    मुख्य न्यायाधीश सुनीता अग्रवाल और न्यायमूर्ति डीएन रे की खंडपीठ ने एकल पीठ (Single Bench) के पूर्ववर्ती फैसले को पूर्णतः बरकरार रखा है। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि एकल पीठ के निर्णय में हस्तक्षेप करने का कोई विधिक आधार नहीं बनता है। इसके साथ ही, अदालत ने अरविंद केजरीवाल पर पूर्व में लगाए गए 25,000 रुपये के आर्थिक जुर्माने को भी यथावत रखा है।

    हाईकोर्ट की खंडपीठ की मुख्य टिप्पणियां

    अदालत ने अपने फैसले में टिप्पणी करते हुए कहा, "प्रकरण के समस्त तथ्यों और परिस्थितियों का समग्र अवलोकन करने पर, अपीलकर्ता की ओर से उठाए गए किसी भी आधार पर चुनौती दिए गए निर्णय में कोई विधिक त्रुटि या खामी नहीं पाई जाती है।" तदनुसार, अदालत ने इस अपील को खारिज कर दिया।

    उल्लेखनीय है कि गुजरात उच्च न्यायालय की एकल पीठ ने गत 31 मार्च 2023 को केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के वर्ष 2016 के उस निर्देश को रद्द कर दिया था, जिसमें डिग्री की जानकारी देने को कहा गया था। साथ ही, अदालत ने सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के कथित दुरुपयोग को लेकर कड़ी टिप्पणी की थी और याचिकाकर्ता के रवैये की आलोचना की थी।

    केजरीवाल के अधिवक्ताओं द्वारा प्रस्तुत दलीलें

    अपील की सुनवाई के दौरान अरविंद केजरीवाल की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने 25,000 रुपये का जुर्माना लगाए जाने के औचित्य पर सवाल खड़े किए थे। उन्होंने तर्क दिया था कि उनके मुवक्किल ने प्रधानमंत्री की डिग्री हासिल करने की मांग पर "लगातार जोर नहीं दिया" था, जबकि एकल पीठ ने अपने आदेश में इसके विपरीत टिप्पणी की थी।

    सिंघवी ने यह भी दलील दी थी कि केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) ने स्वतः संज्ञान (Suo Motu) के आधार पर यह कार्यवाही शुरू की थी और किसी औपचारिक आवेदन के बजाय मात्र एक पत्र के आधार पर केजरीवाल को इस प्रक्रिया में प्रतिवादी बना लिया गया था।

    गुजरात विश्वविद्यालय का पक्ष और सॉलिसिटर जनरल की दलीलें

    गुजरात विश्वविद्यालय की ओर से एकल पीठ के समक्ष यह पक्ष रखा गया था कि प्रधानमंत्री की डिग्री से जुड़ी जानकारी पहले से ही इंटरनेट पर ऑनलाइन उपलब्ध है। हालांकि, बाद में पुनर्विचार याचिका के दौरान केजरीवाल के वकीलों ने दावा किया कि ऐसी कोई जानकारी कभी ऑनलाइन उपलब्ध कराई ही नहीं गई थी, जिसे अदालत ने खारिज कर दिया था।

    विश्वविद्यालय की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इन दलीलों का पुरजोर विरोध किया। उन्होंने कहा कि अरविंद केजरीवाल ने इस मामले को बेवजह तूल दिया और संस्थान की छवि धूमिल करने के उद्देश्य से सार्वजनिक रूप से प्रेस कॉन्फ्रेंस भी कीं। मेहता ने अदालत से कड़ा जुर्माना लगाने का आग्रह करते हुए कहा था कि इससे आरटीआई कानून के दुरुपयोग पर प्रभावी रोक लगेगी और सरकारी अधिकारियों का कीमती कामकाजी समय ऐसे गैर-जरूरी अनुरोधों में बर्बाद नहीं होगा, जिनका जनता से कोई सरोकार नहीं है।

    क्या है प्रधानमंत्री की डिग्री से जुड़ा पूरा प्रकरण?

    यह पूरा कानूनी विवाद वर्ष 2016 का है। उस समय आम आदमी पार्टी के संयोजक ने केंद्रीय सूचना आयोग को एक पत्र प्रेषित कर देश के प्रधानमंत्री की शैक्षणिक डिग्री को सार्वजनिक किए जाने की मांग की थी। अप्रैल 2016 में तत्कालीन सीआईसी एम श्रीधर आचार्युलु ने दिल्ली विश्वविद्यालय और गुजरात विश्वविद्यालय को निर्देश दिया था कि वे प्रधानमंत्री मोदी की डिग्रقियों से संबंधित विवरण केजरीवाल को उपलब्ध कराएं।

    इसके लगभग तीन महीने बाद गुजरात विश्वविद्यालय ने उच्च न्यायालय का रुख किया, जिसके बाद अदालत ने सीआईसी के आदेश के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी थी। सीआईसी का यह आदेश केजरीवाल द्वारा लिखे गए पत्र के ठीक एक दिन बाद आया था, जिसमें उन्होंने यह भी कहा था कि उन्हें अपने निजी या सरकारी रिकॉर्ड सार्वजनिक किए जाने पर कोई आपत्ति नहीं है।

    आरटीआई कानून के दायरे और विश्वविद्यालय की प्रतिक्रिया

    गुजरात विश्वविद्यालय ने सीआईसी के उस आदेश का कड़ा विरोध किया था और कहा था कि किसी व्यक्ति की "गैर-जिम्मेदाराना और बचकानी जिज्ञासा" को आरटीआई कानून के तहत जनहित का मामला नहीं माना जा सकता। मई 2016 में विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति एमएन पटेल ने आधिकारिक रूप से यह जानकारी दी थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 1983 में राजनीति विज्ञान (Political Science) विषय में एमए की डिग्री 62.3 प्रतिशत अंकों के साथ एक बाहरी (External) छात्र के रूप में उत्तीर्ण की थी।

    विश्वविद्यालय ने अपनी वेबसाइट पर डिग्री से जुड़ी प्रासंगिक जानकारी अपलोड करने के साथ-साथ सीआईसी के आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। इसके पश्चात, एकल पीठ ने सीआईसी के निर्देश को खारिज कर दिया था और आरटीआई के दायरे पर टिप्पणी करते हुए जुर्माना लगाया था, जिसे अब उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने भी सही ठहराते हुए अपील को खारिज कर दिया है।

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