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    कोनोकार्पस और एलेस्टोनीया जैसे पौधे रोपित नहीं करें, पर्यावरणविद ने सरकार से की मांग

    भीलवाड़ा में बाबूलाल जाजू ने वन मंत्री और प्रधान मुख्य वन संरक्षक को लिखा पत्र, सरकारी व निजी नर्सरियों में इन कोनोकार्पस और एलेस्टोनीया पौधों की तैयारी रोकने की अपील

    भीलवाड़ा। पर्यावरणविद बाबूलाल जाजू ने राजस्थान के वन मंत्री और प्रधान मुख्य वन संरक्षक को पत्र लिखकर कोनोकार्पस और एलेस्टोनीया जैसे विदेशी पौधों के रोपण को रोकने की मांग की है। उन्होंने पर्यावरण और जनस्वास्थ्य का हवाला देते हुए सरकारी एवं निजी नर्सरियों में इन पौधों को तैयार नहीं करने तथा आमजन से भी इनके रोपण से बचने की अपील की है।

    कोनोकार्पस एलेस्टोनीया पौधे
    कोनोकार्पस एलेस्टोनीया पौधे

    बाबूलाल जाजू के अनुसार वर्तमान में जानकारी के अभाव में लोग कोनोकार्पस और एलेस्टोनीया यानी सप्तपर्णी जैसे पौधों को तेज वृद्धि, सदाबहार हरियाली और आकर्षक स्वरूप के कारण घरों, कॉलोनियों, सरकारी उद्यानों तथा सड़क किनारे बड़ी संख्या में लगा रहे हैं।

    कोनोकार्पस को लेकर जताई पर्यावरणीय चिंता

    जाजू ने पत्र में दावा किया कि कोनोकार्पस को लेकर विभिन्न राज्यों में पर्यावरण एवं स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं सामने आने के बाद गुजरात, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में इसके नए रोपण पर रोक या प्रतिबंध जैसे कदम उठाए जा चुके हैं।

    उन्होंने कहा कि इन पौधों को लगाने से पहले इनके पर्यावरणीय प्रभावों का आकलन किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि कोनोकार्पस अधिक पानी की खपत करने वाला पौधा है और इसके कारण पर्यावरणीय परिस्थितियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

    एलेस्टोनीया की गंध को लेकर भी चिंता

    पर्यावरणविद ने एलेस्टोनीया यानी सप्तपर्णी के फूलों की तेज गंध को लेकर भी चिंता जताई। उनका कहना है कि इसकी गंध कुछ लोगों, विशेषकर एलर्जी और दमा से पीड़ित व्यक्तियों के लिए असुविधा का कारण बन सकती है।

    उन्होंने इन दोनों प्रजातियों के व्यापक रोपण को लेकर सरकारी स्तर पर जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता बताई। साथ ही आमजन से पौधों का चयन करते समय स्थानीय परिस्थितियों और पर्यावरणीय प्रभावों को ध्यान में रखने की अपील की।

    पक्षियों के बसेरे को लेकर भी उठाए सवाल

    जाजू ने दावा किया कि इन पौधों को पशुओं द्वारा नहीं खाए जाने के कारण कई स्थानों पर इन्हें सुरक्षा की दृष्टि से लगाया जाता रहा है। उन्होंने कहा कि इन प्रजातियों के पेड़ों पर पक्षियों का बसेरा भी कम होता है और स्थानीय जैव विविधता के लिहाज से इनके स्थान पर उपयुक्त देशज प्रजातियों के पौधे लगाए जाने चाहिए।

    उन्होंने वन विभाग से मांग की कि सरकारी एवं निजी नर्सरियों में ऐसे पौधों की बिक्री और तैयार किए जाने को लेकर स्पष्ट नीति बनाई जाए तथा आमजन को भी पर्यावरण अनुकूल एवं स्थानीय प्रजातियों के पौधे लगाने के लिए जागरूक किया जाए।

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