सावन के तीसरे सोमवार पर घर-घर हुई नाग देवता की पूजा-अर्चना, सुख-समृद्धि और परिवार की रक्षा की कामना
लक्ष्मणगढ़। सावन महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि पर लक्ष्मणगढ़ कस्बे सहित आसपास के क्षेत्र में नाग पंचमी का पर्व पूर्ण श्रद्धा एवं धार्मिक भावनाओं के साथ मनाया गया। इस अवसर पर महिलाओं ने घरों और मंदिरों में नाग देवता की विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर परिवार की सुख-समृद्धि एवं रक्षा की कामना की। इस बार नाग पंचमी का पर्व सावन के तीसरे सोमवार के अवसर पर आने से श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखने को मिला।
सुबह से ही श्रद्धालु पूजा की तैयारियों में जुटे रहे। महिलाओं ने घरों में कोयले और गेरू से नाग देवता का चित्र बनाया। इसके बाद नाग देवता को अंकुरित अनाज, मूंग, मोठ, चना, दूध, फल एवं फूल अर्पित किए गए। महिलाओं ने व्रत रखकर परिवार की सुख-शांति एवं रक्षा की कामना की तथा एकत्रित होकर नाग पंचमी की कथा भी सुनी।
नाग पंचमी पर श्रद्धा से हुई पूजा
योग शिक्षक पंडित लोकेश कुमार ने बताया कि भगवान शिव के आभूषण माने जाने वाले नाग देवता की पूजा का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यता के अनुसार नाग देवता की आराधना करने से व्यक्ति के जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं और परिवार में सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
उन्होंने बताया कि नाग पंचमी पर श्रद्धालु नाग देवता की पूजा कर उनसे परिवार की रक्षा एवं जीवन में सुख-शांति की कामना करते हैं। धार्मिक मान्यताओं में नाग देवता की पूजा को कालसर्प दोष सहित विभिन्न बाधाओं से राहत से भी जोड़ा गया है।
शिव मंदिरों में महिलाओं ने किया पूजन
नाग पंचमी के अवसर पर महिलाओं ने क्षेत्र के विभिन्न शिव मंदिरों में पहुंचकर शिवलिंग एवं नाग देवता की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की। श्रद्धालुओं ने दूध, फल-फूल और अन्य पूजन सामग्री अर्पित कर परिवार की रक्षा, सुख-शांति एवं समृद्धि की प्रार्थना की।
कस्बे और आसपास के गांवों में पूरे दिन धार्मिक वातावरण बना रहा। महिलाओं ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार नाग देवता का पूजन किया और परिवार की मंगलकामना के लिए व्रत रखा।
श्रद्धा और सकारात्मक भाव से करें आराधना
पंडित लोकेश कुमार ने कहा कि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नाग देवता की पूजा करने से भय, बाधाएं और नकारात्मकता दूर होने की मान्यता है। उन्होंने कहा कि किसी भी धार्मिक पूजा में सबसे महत्वपूर्ण भक्ति, श्रद्धा और सकारात्मक भाव होता है।
उन्होंने कहा कि सच्चे मन से की गई आराधना ही सबसे बड़ा पूजन मानी जाती है। श्रद्धालुओं को धार्मिक पर्वों को केवल परंपरा के रूप में नहीं, बल्कि सकारात्मक विचारों और अच्छे संस्कारों के साथ मनाना चाहिए।
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