मुंबई: बॉम्बे हाईकोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) को महाराष्ट्र के सभी जिलों के शैक्षणिक संस्थानों में हुई नियुक्तियों की व्यापक जांच करने का सख्त निर्देश दिया है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा है कि इस जांच के दायरे से किसी भी संस्थान को छूट नहीं दी जाएगी, चाहे उसका संचालन किसी भी प्रभावशाली राजनेता, जनप्रतिनिधि या वीवीआईपी द्वारा क्यों न किया जाता हो। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रविंद्र घुगे और न्यायमूर्ति गौतम अंखड की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान यह अहम निर्देश जारी किया है।
जांच का दायरा पूरे राज्य में विस्तारित
अदालत ने स्पष्ट किया है कि एसआईटी की जांच केवल नाशिक संभाग तक ही सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इसे राज्य के प्रत्येक जिले तक बढ़ाया जाएगा। प्रबंधन संभालने वाले व्यक्ति या संस्था की राजनीतिक पहुंच या रसूख के आधार पर जांच में कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा। अब इस विशेष जांच का दायरा मुंबई, छत्रपति संभाजीनगर, अमरावती, नागपुर, लातूर और कोल्हापुर समेत महाराष्ट्र के कई अन्य जिलों तक फैल चुका है।
वेतन अनुदान और नियुक्तियों में पारदर्शिता की परख
यह पूरा कानूनी मामला शिक्षा विभाग के विभिन्न अधिकारियों और कर्मचारियों की ओर से दायर याचिकाओं से उपजा है। याचिकाओं में फर्जी या आधारहीन शिकायतों के आधार पर होने वाली दंडात्मक कार्रवाई से संरक्षण देने की मांग की गई थी। पूर्व में भी अदालत ने उन अजनबी व्यक्तियों की शिकायतों पर संज्ञान न लेने की हिदायत दी थी जिनका संबंधित शिक्षक या कर्मचारी से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं था। शालार्थ आईडी रद्द करने और पुराने अनुमोदनों में मनमाने हस्तक्षेप के मामलों के बाद जब कुछ पुलिस एफआईआर दर्ज हुईं, तब सरकार ने एसआईटी गठन की जानकारी दी थी।
दस्तावेजों को आधार बनाने के निर्देश
अदालत ने एसआईटी को निर्देश दिया है कि वह अंतरिम रिपोर्ट के आधार पर हवा-हवाई बातों या अफवाहों के बजाय केवल पुख्ता दस्तावेजों और ठोस तथ्यों को ही अपनी जांच का आधार बनाए। यदि किसी बाहरी व्यक्ति द्वारा कोई शिकायत या सामग्री सौंपी जाती है, तो एसआईटी उससे अपने आरोपों के समर्थन में आधिकारिक हलफनामा मांग सकती है। इसके अलावा, यदि कोई व्यक्ति भ्रामक या जानबूझकर गलत जानकारी देता है, तो एसआईटी उसके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई करने के लिए भी पूरी तरह स्वतंत्र होगी।
सरकारी खजाने के नुकसान की होगी टोह
खंडपीठ ने यह भी रेखांकित किया कि शैक्षणिक संस्थानों में वितरित होने वाला वेतन अनुदान आम जनता के कर (टैक्स) के पैसों से चुकाया जाता है। इसलिए यह सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है कि इन नियुक्तियों में किसी भी प्रकार की वित्तीय अनियमितता या अवैधता न हुई हो, जिससे सरकारी राजकोष को चपत लगी हो। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई आगामी 24 सितंबर के लिए तय की है, जिसमें राज्य सरकार को एसआईटी की अब तक की प्रगति रिपोर्ट पेश करनी होगी।


