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    शिक्षा केवल डिग्री नहीं, संस्कार और जिम्मेदारी भी है : विनोद शर्मा

    ओसवाल स्कूल के निदेशक विनोद कुमार शर्मा से शिक्षक दिवस पर विशेष बातचीत

    अलवर। नगर, जिला डीग (पूर्व भरतपुर) निवासी विनोद कुमार शर्मा शिक्षा जगत में अपने लंबे अनुभव और उल्लेखनीय योगदान के लिए जाने जाते हैं। राज ऋषि कॉलेज, अलवर से उच्च शिक्षा प्राप्त शर्मा एम.ए., बी.एड. एवं एम.एड. हैं। श्री ओसवाल स्कूल में वर्षों तक प्रधानाचार्य रहने के बाद वे 2021 में सेवानिवृत्त हुए और उसी वर्ष अगस्त से ओसवाल स्कूल में निदेशक के पद पर कार्यरत हैं। संभाग, जिला और राज्य स्तर पर अनेक सम्मान प्राप्त कर चुके शर्मा के मार्गदर्शन में शिक्षा पाने वाले विद्यार्थी आज IIT जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों, चिकित्सा, प्रशासन और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में अपनी पहचान बना चुके हैं। शिक्षक दिवस के अवसर पर हमारी टीम ने उनसे विस्तार से बातचीत की। प्रस्तुत हैं उस बातचीत के मुख्य अंश।

    सवाल: आपकी शिक्षा-यात्रा की शुरुआत कहां से हुई, और आपने शिक्षा को ही अपना कार्यक्षेत्र क्यों चुना?

    मेरा मूल संबंध नगर, जिला डीग से है। उच्च शिक्षा के लिए मैंने राज ऋषि कॉलेज, अलवर का रुख किया, जहां से एम.ए., बी.एड. और एम.एड. पूरी की। इसी दौर में मेरा जुड़ाव शिक्षा से हुआ। धीरे-धीरे यह समझ बनी कि शिक्षक होना महज एक पेशा नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र का भविष्य गढ़ने की जिम्मेदारी है। यही विचार आगे चलकर मेरी पूरी कार्ययात्रा की नींव बना।

    सवाल: आपकी नजर में एक अच्छे शिक्षक की सबसे बड़ी पहचान क्या होती है?

    एक अच्छे शिक्षक को सिर्फ इस आधार पर नहीं आंका जा सकता कि उसके विद्यार्थी कितने अंक लाते हैं। असली सफलता तब मानी जाती है जब कोई विद्यार्थी शिक्षा पूरी करने के बाद एक अच्छा इंसान और जिम्मेदार नागरिक बने। ज्ञान के साथ-साथ संस्कार, अनुशासन, संवेदनशीलता और उत्तरदायित्व का भाव होना उतना ही जरूरी है। मैंने हमेशा यही कोशिश की कि विद्यार्थियों को पढ़ाई के साथ जीवन-मूल्यों की सीख भी मिलती रहे।

    सवाल: प्रधानाचार्य के तौर पर आपका लंबा अनुभव रहा है। उस भूमिका में सबसे बड़ी चुनौती क्या महसूस हुई?

    प्रधानाचार्य का पद केवल प्रशासन संभालने तक सीमित नहीं है। इसमें विद्यार्थियों, शिक्षकों, अभिभावकों और संस्था — इन सबके बीच संतुलन बनाए रखना पड़ता है। सबसे बड़ी चुनौती यह रहती है कि विद्यालय में ऐसा माहौल तैयार हो जहां शिक्षक पूरी निष्ठा से पढ़ाएं और विद्यार्थी बिना किसी भय के सीख सकें। मेरा हमेशा प्रयास रहा कि विद्यालय में अनुशासन और आत्मीयता, दोनों साथ-साथ बने रहें।

    सवाल: आपको शिक्षा के क्षेत्र में कई बड़े सम्मान मिले हैं। इनमें से कौन-सा सम्मान आपके लिए सबसे खास है?

    हर सम्मान मेरे लिए एक नई प्रेरणा रहा है। 1997-98 में जयपुर संभाग स्तर पर गुरु सांदीपन अवार्ड मिला, फिर 1998-99 में श्रेष्ठ विद्यालय संस्था-प्रधान अवार्ड। 2012 में मुख्यमंत्री के हाथों राज्यपाल अवार्ड यानी राज्य-स्तरीय शिक्षक सम्मान मिला। इसके बाद 2013 में अलवर गौरव अवॉर्ड, 2014 में जिला कलेक्टर द्वारा गणतंत्र दिवस समारोह में सम्मान, 2016 में SBI प्रबंधन की ओर से जिला-स्तरीय शिक्षक सम्मान और 2017 में सृजक श्री सम्मान से नवाजा गया।जिले की कई संस्थाओं ने भी समय-समय पर श्रेष्ठ शिक्षक के रूप में सम्मानित किया।लेकिन सच कहूं तो मेरे लिए असली पुरस्कार मेरे विद्यार्थियों की सफलता है। जब कोई विद्यार्थी आगे बढ़कर समाज और देश के लिए काम करता है, तो एक शिक्षक को उससे बड़ा संतोष किसी सम्मान से नहीं मिलता।

    सवाल: आपके विद्यार्थियों ने अलग-अलग क्षेत्रों में उल्लेखनीय सफलता पाई है। आप इसे किस नजरिए से देखते हैं?

    यह किसी एक व्यक्ति की उपलब्धि नहीं है। किसी भी विद्यार्थी की सफलता के पीछे उसके माता-पिता, शिक्षक, विद्यालय और खुद उसकी मेहनत सबका योगदान होता है। हमारे विद्यालय के कई पूर्व विद्यार्थी IIT और समकक्ष संस्थानों तक पहुंचे और आज विभिन्न संस्थानों के प्रबंधन व नेतृत्व में योगदान दे रहे हैं। कई पूर्व विद्यार्थी कॉलेजों-विश्वविद्यालयों में प्राध्यापक और व्याख्याता बने, कई चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े प्रतिष्ठित संस्थानों में समाज-सेवा कर रहे हैं, तो कुछ ने भारतीय और राज्य प्रशासनिक सेवाओं में अपनी अलग पहचान बनाई है। यह देखकर बेहद संतोष होता है कि हमारे विद्यार्थी अलग-अलग क्षेत्रों से देश की सेवा कर रहे हैं।

    सवाल: विद्यार्थियों को सफल बनाने के लिए आप किन बातों को सबसे ज्यादा अहमियत देते हैं?

    सबसे पहले जरूरी है विद्यार्थी की क्षमता को पहचानना। हर बच्चा अलग होता है किसी की रुचि विज्ञान में होती है, किसी की कला में, किसी की खेल में तो किसी की प्रशासन या चिकित्सा में। एक शिक्षक का काम सिर्फ पाठ्यक्रम पूरा कराना नहीं, बल्कि विद्यार्थी की क्षमता पहचानकर उसे सही दिशा देना भी है। इसके साथ मेहनत, समय का सही उपयोग, अनुशासन और सकारात्मक सोच बेहद जरूरी हैं। मैं हमेशा विद्यार्थियों को यही समझाता रहा हूं कि सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता।

    सवाल: आज की शिक्षा व्यवस्था में आपको सबसे बड़ा बदलाव क्या नजर आता है?

    आज शिक्षा के साधन काफी बढ़ गए हैं। तकनीक ने विद्यार्थियों के सामने ज्ञान के नए रास्ते खोले हैं। इंटरनेट और डिजिटल माध्यमों के जरिए विद्यार्थी दुनिया-भर के श्रेष्ठ शिक्षकों और संस्थानों से जुड़ सकते हैं। लेकिन तकनीक का सही और संतुलित उपयोग बेहद जरूरी है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि तकनीक विद्यार्थी की मददगार बने, न कि उसकी एकाग्रता को कमजोर करने वाली। तकनीक का इस्तेमाल जरूर हो, लेकिन शिक्षक और विद्यार्थी के बीच का मानवीय रिश्ता भी उतना ही मजबूत बना रहे।

    सवाल: क्या आपको लगता है कि आज की पीढ़ी में संस्कारों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है?

    बिल्कुल। शिक्षा और संस्कार एक-दूसरे से अलग नहीं किए जा सकते। अच्छे अंक लाने वाला विद्यार्थी अगर समाज के प्रति जिम्मेदार नहीं है, तो उसकी शिक्षा अधूरी ही मानी जाएगी। हमें बच्चों को माता-पिता, शिक्षकों और बुजुर्गों का सम्मान करना, जरूरतमंदों की मदद करना, पर्यावरण के प्रति सजग रहना और देश के प्रति अपने कर्तव्य को समझना सिखाना होगा। मेरी हमेशा कोशिश रही है कि विद्यार्थी अच्छे करियर के साथ-साथ अच्छा चरित्र भी विकसित करें।

    सवाल: 2021 में प्रधानाचार्य पद से सेवानिवृत्त होने के बाद भी आप शिक्षा से जुड़े रहे। इसकी वजह क्या रही?

    शिक्षा से मेरा रिश्ता किसी नौकरी से कहीं आगे का है, इसलिए सेवानिवृत्ति के बाद भी शिक्षा से दूर हो जाने की कभी कल्पना नहीं की। अगस्त 2021 से मैं ओसवाल स्कूल ग्रुप में निदेशक के रूप में काम कर रहा हूं। यहां अपने अनुभव का उपयोग संस्था की शैक्षिक व्यवस्था को बेहतर बनाने और विद्यार्थियों का भविष्य संवारने में करना मेरे लिए संतोष की बात है।

    सवाल: आज के शिक्षकों के लिए आपका क्या संदेश है?

    शिक्षक खुद लगातार सीखते रहें, तभी वे विद्यार्थियों को आगे बढ़ा पाएंगे। समय बदल रहा है, इसलिए शिक्षकों को भी नई तकनीक, नई शिक्षण पद्धतियों और विद्यार्थियों की बदलती मानसिकता को समझना होगा। साथ ही शिक्षक को अपने आचरण से एक मिसाल पेश करनी चाहिए, क्योंकि विद्यार्थी शिक्षक की बातें सुनने से ज्यादा उसके व्यवहार से सीखता है। इसीलिए शिक्षक का चरित्र और व्यवहार ही उसकी सबसे बड़ी पाठशाला है।

    सवाल: अंत में, शिक्षा को लेकर आपका मूल उद्देश्य क्या रहा है?

    मेरा मूल उद्देश्य हमेशा यही रहा है कि विद्यार्थी को ऐसी शिक्षा मिले जिससे वह जीवन में सफल होने के साथ-साथ एक अच्छा नागरिक भी बने। शिक्षा उसे रोजगार दे, लेकिन संस्कार उसे समाज से जोड़ें; ज्ञान उसे आगे बढ़ाए और जिम्मेदारी उसे सही दिशा दिखाए। अगर हमारे विद्यार्थी अपने-अपने क्षेत्र में ईमानदारी, मेहनत और संवेदनशीलता के साथ काम कर रहे हैं, समाज के लिए उपयोगी साबित हो रहे हैं और देश के विकास में योगदान दे रहे हैं, तो मैं मानता हूं कि एक शिक्षक के रूप में हमारा प्रयास सार्थक हुआ है।

    सवाल: आपके लिए शिक्षक होने का सबसे बड़ा पुरस्कार क्या है?

    मेरे लिए सबसे बड़ा पुरस्कार वह पल है जब कोई पूर्व विद्यार्थी सालों बाद मिलकर कहता है “सर, आपने जो रास्ता दिखाया था, वह आज भी मेरे काम आ रहा है।” इससे बड़ी खुशी एक शिक्षक के लिए और कुछ नहीं हो सकती।

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