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    तीर्थंकरों का ध्यान कर लो आत्म जागरण हो जाएगा-आचार्य पुलकसागर महाराज

    गर्व से कहे हम जैन है ओर हमे जिनेन्द्र भगवान की शरण मिली है, आचार्य पुलकसागर ससंघ के सानिध्य में सूर्यमहल में चातुर्मासिक प्रवचन

    भीलवाड़ा। दुनिया में किसी का भी ध्यान कर लो राग द्धेष बढ़ेगा पर तीर्थंकरों का ध्यान कर लो जीवन कल्याणकारी हो जाएगा। शरीर की बजाय आत्मा से तीर्थंकरों का ध्यान करने से आत्म जागरण हो जाएगा। तीर्थंकरों का रूपस्थ ध्यान करने से आपके कषाय शांत हो जाएंगे। भगवान के रूप का ध्यान करने से प्राणायाम स्वयं हो जाएगा। भगवान में अनंत गुण होने से अरिहन्त शरण, सिद्ध शरण का ध्यान करने से सारे कषायों व पापों का नाश होगा।

    ये विचार श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर ट्रस्ट, मैन सेक्टर शास्त्रीनगर के तत्वावधान में सकल दिगम्बर जैन समाज की ओर से भीलवाड़ा में पहली बार चातुर्मास कर रहे राष्ट्र संत मनोज्ञाचार्य पुलकसागरजी महाराज ने शास्त्रीनगर स्थित सूर्यमहल में रविवार को चातुर्मासिक प्रवचन में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि जब तक हम तीर्थंकरों को जानेंगे नहीं उनकी कृपा कैसे प्राप्त कर पाएंगे। गर्व से कहना चाहिए कि हम जैन है ओर हमे जिनेन्द्र भगवान की शरण मिली है। तीर्थंकरों का पुण्य अनंत होता है जब ध्यान करने बैठे तो भगवान के परम पवित्र शरीर का ध्यान करे इसे रूपस्थ ध्यान कहते है।

    आचार्यश्री ने कहा कि इंसान का शरीर बना नहीं बनाया जाता है ओर जिसका निर्माण होता है उसका नाश भी होता है। आत्मा बनती नहीं इसलिए नष्ट भी नहीं होती है। तीर्थंकरों जैसा सुंदर रूप किसी का नहीं होता है ओर उनका शरीर ओदारिक होने से उस पर बढ़ती आयु का भी कोई असर नहीं होता है। अपने तीर्थंकरों पर श्रद्धा रखों वहीं भगवान है। उन्होंने कहा कि भगवान के लक्षण इसलिए बताए गए है कि इस पंचम काल में कोई व्यक्ति स्वयं को भगवान नहीं बता सके। हमारा शरीर दिनोंदिन नष्ट होता जाता जबकि तीर्थंकर का शरीर चमकता जाता है।

    आचार्य पुलकसागर महाराज ने कहा कि तीर्थंकरों का शरीर परम औदारिक देह होने से निरन्तर शुद्ध होता रहता है ओर उसमें मल मूत्र नहीं होते है। इंसान का शरीर ऐसा नहीं होता है। भगवान जब तक घर में रहते है अमृतपान करते है। तीर्थंकर का शरीर पाना है तो भगवान के रूप का ध्यान करना होगा। भगवान ने भी कई जन्मों तक रूपस्थ ध्यान किया तब उन्हें तीर्थंकर का शरीर मिला।

    उन्होंने कहा कि तीर्थंकर बने तीर्थंकरों को वह औदारिक शरीर उनके कर्मो से मिला ओर हमे इंसानी शरीर भी अपने कर्मो से प्राप्त हुआ है। तीर्थंकरों की आत्मा शुद्ध,गुण अनंत एवं शरीर परम औदारिक है। ऐसे तीर्थंकरों का ध्यान करने से ओर उनके बारे में श्रवण करने से हमारे पाप कर्म की निर्जरा होती है। भगवान की दृष्टि कृपा जिस पर हो जाए उसे अनंत सुखों की प्राप्ति होती है।

    श्री पुलकसागर चातुर्मास समिति के अध्यक्ष प्रवीण चौधरी ने बताया कि आचार्य पुलकसागर महाराज के सानिध्य में पर्युषण (दशलक्षण) पर्व की साधना 16 से 25 सितम्बर तक सूर्यमहल में होगी। इस अवधि में दस दिवसीय पाप नाशनम शिविर का भी आयोजन किया जाएगा। इस शिविर के लिए अब तक सैकड़ो श्रावक श्राविकाएं पंजीयन करा चुके है। प्रवचन के शुरू में दीप प्रज्वलन,पाद प्रक्षालन एवं शास्त्र भेंट का सौभाग्य दीपक, नीरू अजमेरा परिवार ने प्राप्त किया।

    चातुर्मास समिति के संयोजक मनीष शाह एवं सह संयोजक लोकेश अजमेरा ने बताया कि प्रतिदिन चातुर्मासिक प्रवचन सुबह 8.30 से 10 बजे तक सूर्यमहल में हो रहे है। शाम 7 से 8 बजे तक आनंद यात्रा एवं आरती का आयोजन किया जा रहा है जिसमें भी शहर के विभिन्न क्षेत्रों से श्रद्धालु शामिल होकर लाभ प्राप्त कर रहे है।

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