अपने को अच्छा ओर दूसरों को नीचा दिखाने का प्रयास करने पर टुकड़ों में बंट जाता समाज, आचार्य पुलकसागर ससंघ के सानिध्य में सूर्यमहल में चातुर्मासिक प्रवचन
भीलवाड़ा। जैसे तीर्थंकर परमात्मा सभी के होते है वैसे ही मुनिराज भी सभी के होते है उनमें किसी प्रकार का भेद करना पाप का कार्य है। साधु को केवल शिष्य बनाने से मोक्ष प्राप्त नहीं होता। धर्म के क्षेत्र में भी विकृतियां आने से दुर्दशा हो रही है। साधु खुद का प्रचार छोड़कर तीर्थंकरों का प्रचार करना शुरू कर दे तो समाज एक हो जाएगा लेकिन साधु जब खुद को तीर्थंकर साबित करता है तो समाज में राजनीति हो जाती है।
ये विचार श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर ट्रस्ट, मैन सेक्टर शास्त्रीनगर के तत्वावधान में सकल दिगम्बर जैन समाज की ओर से भीलवाड़ा में पहली बार चातुर्मास कर रहे राष्ट्र संत मनोज्ञाचार्य पुलकसागरजी महाराज ने शास्त्रीनगर स्थित सूर्यमहल में मंगलवार को चातुर्मासिक प्रवचन में व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि हम एक-दूसरे को अच्छा खराब बताने की बजाय सभी महावीर की प्रभावना करें। दिगम्बर हो या श्वेताम्बर, श्रावक हो या मुनि सभी तीर्थंकरों की ओर महावीर की आराधना करेंगे तो पंथ अपने आप खत्म हो जाएंगे लेकिन जब पंथ अपनी-अपनी प्रभावना ओर हर व्यक्ति खुद की प्रभावना करते हुए अपने को अच्छा ओर दूसरों को नीचा दिखाने का प्रयास करता है समाज टुकड़ों में बंट जाता है।
आचार्यश्री ने कहा कि चिंतन करना होगा कि हम अपनी प्रभावना करे या महावीर की प्रभावना करे। जैन धर्म के चारों समाज मिलकर महावीर के लिए जीना शुरू कर दे तो हमसे बड़ी ताकत दुनिया में किसी को पास नहीं होगी। जब हम अपने-अपने लिए जीना शुरू करते है तो ताकत बंट जाती है। हमारा पंथ कोई भी हो पर महावीर के लिए एक होना चाहिए। पंथ अपने नहीं पर परमात्मा हमारा है चाहे वह कहीं भी हो।
उन्होंने कहा कि कहीं भी साधु जाए तो समाज में आनंद व एकता के भाव आने चाहिए पर आजकल उनके आने से समाज टूट जाता है। जो साधु ऐसा करेंगे वह धर्म ओर प्रेम का उपदेश कैसे देंगे। धर्म के नाम पर राजनीति अधोगति का कारण होता है। हमारा इष्ट गुरू कोई भी हो पर सम्मान सभी आराध्य व आधिकारिक गुरूओं का होना चाहिए। जो ऐसा नहीं करते वह मिथ्यादृष्टि होते ओर कभी सम्यक दृष्टि नहीं हो सकते।
आचार्य पुलकसागर महाराज ने कहा कि जो शिक्षा,दीक्षा एवं प्रायश्चित देते वह आचार्य होते है, जो पठन पाठन कराते है वह उपाध्याय होते है ओर जो चुपचाप साधना करते है वह साधु होते है। मुनि दो प्रकार के होते है एक वह जो वन में रहते वह वनवासी होते ओर दूसरे चेत्यवासी जो चेत्यालय, जिनालय, मंदिर आदि में रहकर साधना करते है।
उन्होंने कहा कि पंचमकाल में सारे मुनि चेत्यवासी है अब ऐसे कोई मुनि नहीं है जो एक बार वन गए और कभी लौटकर नहीं आए। ऐसे मुनि चौथे काल में थे जिन्हें देखने की हम भी कामना करते है। कुछ दिन जंगल में जाने से कोई वनवासी नहीं कहला सकता है। वनवासी को जिनकल्पी जो जिनेश्वर जैसे होते ओर चेत्यवासी को स्थिरकल्पी कहा गया है जो उनसे कुछ कम होते है। मुनि के मन में राग द्वेष नहीं होते उनके मन में समता भाव होते है।
श्री पुलकसागर चातुर्मास समिति के अध्यक्ष प्रवीण चौधरी ने बताया कि आचार्य पुलकसागर महाराज के सानिध्य में पर्युषण (दशलक्षण) पर्व की साधना 16 से 25 सितम्बर तक सूर्यमहल में होगी। इस अवधि में दस दिवसीय पाप नाशनम शिविर का भी आयोजन किया जाएगा। इस शिविर के लिए अब तक सैकड़ो श्रावक श्राविकाएं पंजीयन करा चुके है।
प्रवचन के शुरू में दीप प्रज्वलन,पाद प्रक्षालन एवं शास्त्र भेंट का सौभाग्य कमलादेवी, राजकुमार, दिलीप गदिया परिवार ने प्राप्त किया। चातुर्मास समिति के संयोजक मनीष शाह एवं सह संयोजक लोकेश अजमेरा ने बताया कि प्रतिदिन चातुर्मासिक प्रवचन सुबह 8.30 से 10 बजे तक सूर्यमहल में हो रहे है। शाम 7 से 8 बजे तक आनंद यात्रा एवं आरती का आयोजन किया जा रहा है जिसमें भी शहर के विभिन्न क्षेत्रों से श्रद्धालु शामिल होकर लाभ प्राप्त कर रहे है।
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