मुंबई। आर्थिक राजधानी मुंबई में मच्छर जनित बीमारी मलेरिया के सबसे खतरनाक और गंभीर रूप माने जाने वाले 'प्लास्मोडियम फाल्सीपेरम' (P. Falciparum) के मामलों में पिछले एक दशक में चिंताजनक बढ़ोतरी दर्ज की गई है। महानगरपालिका (बीएमसी) के स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार, शहर में इसके मामले साल 2015 के 375 से बढ़कर 2025 में 2,382 पर पहुंच गए हैं। इस अवधि के दौरान कुल मलेरिया मामलों में फाल्सीपेरम की हिस्सेदारी भी 5.5 प्रतिशत से बढ़कर 25.3 प्रतिशत हो गई है।
जांच बढ़ने के साथ फाल्सीपेरम के मामलों में उछाल
बीएमसी अधिकारियों का कहना है कि मामलों में इस बड़ी बढ़ोतरी के पीछे एक मुख्य वजह स्वास्थ्य विभाग द्वारा जांच (टेस्टिंग) की संख्या में इजाफा होना भी है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2015 से 2025 के बीच कुल मलेरिया जांच में करीब 32.3 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है, जिसके तहत जांच का दायरा 14,28,265 से बढ़कर 18,89,012 तक पहुंच गया है।
क्यों खतरनाक माना जाता है फाल्सीपेरम मलेरिया?
विशेषज्ञ डॉक्टरों के अनुसार, प्लास्मोडियम वाइवैक्स मलेरिया की तुलना में फाल्सीपेरम का संक्रमण बेहद गंभीर स्थिति पैदा कर सकता है। समय पर उचित इलाज न मिलने पर यह शरीर के महत्वपूर्ण अंगों की कार्यप्रणाली को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है। कई मामलों में शुरुआती लक्षणों को सामान्य फ्लू या वायरल बुखार समझ लिया जाता है, जिससे बीमारी बढ़ जाती है। इसके गंभीर मामलों में तेजी से हीमोग्लोबिन गिरना और किडनी प्रभावित होने का जोखिम रहता है।
डॉक्टरों की सलाह और शुरुआती लक्षण
चिकित्सकों का कहना है कि भले ही शुरुआती एक-दो दिनों में बुखार के प्रकार को पहचानना मुश्किल हो, लेकिन तेज बुखार के साथ यदि शरीर में पानी की कमी, लगातार जी मिचलाना या उल्टी जैसे लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। डॉक्टरों ने नागरिकों से अपील की है कि वे बुखार को सामान्य मानकर खुद से दवाएं लेने के बजाय समय पर चिकित्सकीय जांच करवाएं।


